देहरादून/श्रीनगर: उत्तर भारत के पर्वतीय राज्यों में इस साल कुदरत का दोहरा कहर देखने को मिल रहा है। एक ओर जहाँ उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और कश्मीर के ऊंचे शिखर जनवरी के महीने में भारी बर्फबारी के लिए जाने जाते हैं, वहीं इस बार ‘विंटर डैफिसिट’ (बर्फबारी की कमी) के कारण जंगल भीषण आग की चपेट में हैं। उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं मंडल से लेकर कश्मीर की वादियों तक सैकड़ों हेक्टेयर वन संपदा जलकर खाक हो चुकी है। विशेषज्ञों का कहना है कि सर्दियों में जंगलों का इस तरह धधकना एक दुर्लभ और डरावनी घटना है, जिसने पिछले कई दशकों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। नमी की कमी और सूखे पेड़ों के कारण आग इतनी तेजी से फैल रही है कि प्रशासन के लिए इस पर काबू पाना बड़ी चुनौती बन गया है।
बर्फबारी की कमी बनी आग की मुख्य वजह
मौसम विज्ञानियों के अनुसार, इस साल ‘वेस्टर्न डिस्टर्बेंस’ (पश्चिमी विक्षोभ) के कमजोर पड़ने से पहाड़ों पर बर्फ नहीं गिरी है:
- सूखा भूभाग: बर्फ और बारिश न होने के कारण जंगलों में बिछी सूखी पत्तियां और घास ‘बारूद’ की तरह काम कर रही हैं, जहाँ एक छोटी सी चिंगारी भी विकराल आग का रूप ले रही है।
- तापमान में बढ़ोतरी: सामान्य से अधिक तापमान होने के कारण पेड़ों की नमी खत्म हो गई है, जिससे आग बुझने के बजाय और भड़क रही है।
- पारिस्थितिकी असंतुलन: सर्दियों में आग लगने से जमीन की ऊपरी उपजाऊ परत नष्ट हो रही है, जिसका असर आने वाले समय में वनस्पतियों और वन्यजीवों पर पड़ेगा।
उत्तराखंड से कश्मीर तक हाहाकार
पहाड़ी राज्यों में स्थिति लगातार चिंताजनक बनी हुई है:
- उत्तराखंड: अल्मोड़ा, बागेश्वर और पौड़ी जिलों के ऊंचे पहाड़ों पर आग लगने की घटनाएं सामने आई हैं। धुएं के कारण पहाड़ों पर ‘स्मॉग’ जैसी स्थिति पैदा हो गई है, जिससे दृश्यता (Visibility) कम हो गई है।
- कश्मीर घाटी: कश्मीर के बारामूला और गांदरबल क्षेत्रों के जंगलों में भी आग की लपटें देखी गई हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, उन्होंने दशकों में पहली बार जनवरी में जंगलों को इस तरह जलते देखा है।
- हिमाचल प्रदेश: शिमला और कुल्लू के आसपास के जंगलों में भी छिटपुट आग की खबरें हैं, जिससे बहुमूल्य देवदार के जंगलों को खतरा पैदा हो गया है।
प्रशासनिक मुस्तैदी और बचाव कार्य
वन विभाग और आपदा प्रबंधन टीमें (SDRF) आग बुझाने के लिए युद्धस्तर पर प्रयास कर रही हैं:
- फायर वॉचरों की तैनाती: संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त फायर वॉचर तैनात किए गए हैं जो आग लगने की सूचना तत्काल कंट्रोल रूम को दे रहे हैं।
- तकनीक का सहारा: आग के हॉटस्पॉट्स (Hotspots) की पहचान करने के लिए सैटेलाइट डेटा और ड्रोन का इस्तेमाल किया जा रहा है।
- जनजागरूकता: सरकार ग्रामीणों से अपील कर रही है कि वे घास के मैदानों में आग न लगाएं और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की जानकारी दें।
पहाड़ों पर बर्फ की जगह आग का दिखना जलवायु परिवर्तन (Climate Change) का एक स्पष्ट और डरावना संकेत है। यदि जल्द ही बर्फबारी या बारिश नहीं होती है, तो यह आग न केवल वन संपदा को नष्ट करेगी, बल्कि हिमालयी क्षेत्रों के जल स्रोतों को भी सुखा सकती है। वर्तमान स्थिति पर्यावरणविदों के लिए गहरी चिंता का विषय है और यह प्रकृति के साथ हो रहे खिलवाड़ के परिणामों की ओर इशारा कर रही है।





