Sunday, November 30, 2025

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हिमालयी राज्यों के लिए अलग सैटेलाइट समूह की मांग, उत्तराखंड ने केंद्र के सामने रखा प्रस्ताव — आपदा प्रबंधन में सटीक निगरानी होगी संभव

देहरादून।
हर साल प्राकृतिक आपदाओं से जूझने वाला उत्तराखंड अब इससे बचाव और राहत कार्यों को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रहा है। राज्य सरकार ने केंद्र सरकार से हिमालयी राज्यों के लिए अलग सैटेलाइट समूह (Satellite Constellation) बनाने की मांग की है। इस प्रस्ताव को हाल ही में दिल्ली में आयोजित “स्पेस मीट” के दौरान रखा गया, जहां उत्तराखंड की ओर से सचिव (आईटी) नितेश झा ने आपदा प्रबंधन, पूर्व चेतावनी और पुनर्वास कार्यों से जुड़ी विस्तृत प्रस्तुति दी।

आपदा से पहले की तैयारी: उच्च रिजॉल्यूशन सैटेलाइट सिस्टम की मांग

उत्तराखंड ने प्रस्ताव दिया है कि हिमालयी क्षेत्रों के लिए बहुत उच्च गुणवत्ता वाले सैटेलाइट चित्र, यानी 50 सेंटीमीटर से कम स्पष्टता वाले इमेज उपलब्ध कराए जाएं। इनसे पर्वतीय इलाकों का विस्तृत नक्शा तैयार करना और भूस्खलन, बाढ़ या हिमपात जैसे संभावित खतरों की निगरानी करना आसान होगा।

राज्य ने यह भी सुझाव दिया है कि हाई रिजॉल्यूशन डिजिटल एलिवेशन मॉडल (DEM) और लिडार तकनीक को शामिल किया जाए, ताकि ऊंचाई और स्थलाकृति की सटीक जानकारी मिल सके। इन तकनीकों से भू-संरचना के सूक्ष्म बदलावों का विश्लेषण कर भूस्खलन या बाढ़ जैसी आपदाओं की पहले से चेतावनी देने वाला उन्नत प्रणाली विकसित की जा सके।

सचिव झा ने कहा कि हिमालय क्षेत्र की भौगोलिक विशेषताएं बेहद जटिल हैं, इसलिए इसके लिए विशेष सैटेलाइट समूह की आवश्यकता है, जो केवल हिमालयी राज्यों के मौसम, जलस्तर, हिमपात और जलवायु परिवर्तन से जुड़े आंकड़ों की निगरानी और विश्लेषण पर केंद्रित हो।

क्लाइमेट ऑब्जर्वेटरी की स्थापना की सिफारिश

राज्य ने केंद्र से यह भी आग्रह किया है कि हिमालयी क्षेत्र में समर्पित क्लाइमेट ऑब्जर्वेटरी (Climate Observatory) स्थापित की जाए। यह केंद्र जलवायु परिवर्तन और उसके स्थानीय प्रभावों की निरंतर निगरानी करेगा। इसके जरिए पहाड़ी राज्यों में मौसम संबंधी पैटर्न, हिमनदों के पिघलने और जल संसाधनों पर इसके असर का रियल टाइम विश्लेषण किया जा सकेगा।

आपदा के बाद सैटेलाइट आधारित संचार प्रणाली की जरूरत

नितेश झा ने कहा कि आपदा के बाद पहाड़ी इलाकों में संचार व्यवस्था अक्सर पूरी तरह ठप हो जाती है। ऐसे में सैटेलाइट आधारित संचार नेटवर्क से राहत और बचाव अभियानों को संचालित करना बेहद आसान होगा। उन्होंने सुझाव दिया कि आपदा के बाद भी नियमित रूप से सैटेलाइट डाटा उपलब्ध कराया जाए, जिससे नदियों के अवरोध या अस्थायी झीलों की तुरंत पहचान की जा सके।

बादलों के बीच भी मिले स्पष्ट तस्वीरें

धराली आपदा के दौरान बादलों और खराब मौसम के कारण सैटेलाइट तस्वीरें धुंधली आ रही थीं। इस अनुभव को ध्यान में रखते हुए राज्य ने सिंथेटिक अपर्चर रडार (SAR) तकनीक को शामिल करने की भी सिफारिश की है। यह रडार प्रणाली बादलों और वर्षा के दौरान भी स्पष्ट तस्वीरें देने में सक्षम होती है, जिससे आपदा के बाद प्रभावित क्षेत्रों की स्थिति का आकलन सटीक रूप से किया जा सकता है।

आपदा प्रबंधन में आएगा तकनीकी बदलाव

उत्तराखंड सरकार का मानना है कि यदि हिमालयी राज्यों के लिए अलग सैटेलाइट समूह की स्थापना हो जाती है, तो इससे न केवल आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली मजबूत होगी, बल्कि राहत, पुनर्वास और पर्यावरणीय निगरानी में भी बड़ी क्रांति आएगी। इस पहल से हिमालयी पारिस्थितिकी की रक्षा के साथ मानव जीवन और बुनियादी ढांचे को होने वाले नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकेगा।

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