नैनीताल: चेक बाउंस (धारा 138, एनआई एक्ट) के बढ़ते मामलों के त्वरित निस्तारण की दिशा में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एक युगांतकारी निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अब चेक बाउंस की शिकायतों में प्रतिवादियों को समन तामील कराने के लिए केवल पारंपरिक डाक पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं होगी; अब व्हाट्सएप, ई-मेल और अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से भेजे गए समन को भी कानूनी रूप से वैध माना जाएगा।
अदालत ने क्यों लिया यह फैसला?
न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकल पीठ ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश जारी किए। अक्सर देखा गया है कि चेक बाउंस के मामलों में आरोपी जानबूझकर समन लेने से बचते हैं या डाक द्वारा समन पहुंचने में लंबा समय लग जाता है। इससे अदालती कार्यवाही वर्षों तक अटकी रहती है। हाई कोर्ट ने माना कि आधुनिक तकनीक का उपयोग करके न्याय प्रक्रिया में होने वाली इस अनावश्यक देरी को समाप्त किया जा सकता है।
फैसले की मुख्य बातें और शर्तें
उच्च न्यायालय ने इस नई व्यवस्था को लागू करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश भी तय किए हैं:
- इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की मान्यता: यदि शिकायतकर्ता आरोपी के व्हाट्सएप नंबर या ई-मेल पते पर समन भेजता है, तो उसे ‘डिलीवर्ड’ (व्हाट्सएप पर डबल टिक) होने पर वैध तामील माना जा सकता है।
- पारदर्शिता और रिकॉर्ड: समन भेजने वाले को अदालत में इस बात का प्रमाण (स्क्रीनशॉट या रसीद) प्रस्तुत करना होगा कि समन सही व्यक्ति के नंबर या पते पर भेजा गया है।
- त्वरित सुनवाई: इस फैसले के बाद अब निचली अदालतों में लंबित हजारों चेक बाउंस मामलों की सुनवाई में तेजी आएगी, क्योंकि समन तामील न होने का बहाना अब नहीं चलेगा।
आम जनता और वकीलों पर प्रभाव
कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला न केवल समय की बचत करेगा, बल्कि न्याय प्रणाली में पारदर्शिता भी लाएगा। डिजिटल युग में इस तरह के कदम से उन लोगों को बड़ी राहत मिलेगी जिनका पैसा चेक बाउंस होने के कारण फंसा हुआ है। इससे मुकदमेबाजी के खर्चों में भी कमी आने की उम्मीद है।
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के उन सुझावों का भी हवाला दिया है, जिनमें अदालती कार्यप्रणाली को डिजिटल बनाने और आधुनिक संचार माध्यमों को अपनाने की बात कही गई थी।





