Thursday, March 5, 2026

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सुप्रीम कोर्ट ने थामे UGC के नए नियम: 2026 के ‘इक्विटी रेगुलेशंस’ पर अंतरिम रोक; CJI बोले- “इनका दुरुपयोग हो सकता है, समाज बिखर जाएगा”

नई दिल्ली: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा हाल ही में अधिसूचित किए गए ‘इक्विटी रेगुलेशंस-2026’ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। देश भर में हो रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच, शीर्ष अदालत ने इन नए नियमों के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी की कि ये नियम “विभाजनकारी” हो सकते हैं और इनका समाज पर “खतरनाक प्रभाव” पड़ सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक इस मामले की अगली सुनवाई नहीं होती, तब तक 2012 के पुराने भेदभाव-रोधी नियम ही प्रभावी रहेंगे।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ? (प्रमुख घटनाक्रम)

सुनवाई के दौरान अदालत ने नियमों की शब्दावली और उनके संभावित परिणामों पर गंभीर चिंता व्यक्त की।

  • 2012 के नियम रहेंगे लागू: कोर्ट ने आदेश दिया कि संस्थानों में भेदभाव संबंधी शिकायतों के निपटारे के लिए फिलहाल 2012 की गाइडलाइंस का पालन किया जाए, ताकि छात्र बिना किसी कानूनी उपचार के न रहें।
  • सीजेआई की तीखी टिप्पणी: CJI सूर्यकांत ने नाराजगी जताते हुए कहा, “भगवान के लिए! आज अंतर-जातीय विवाह हो रहे हैं, हम सब हॉस्टलों में साथ रहे हैं। इन नए नियमों की भाषा ऐसी है कि इनका दुरुपयोग हो सकता है। क्या हम पिछले 75 वर्षों की प्रगति को पीछे ले जा रहे हैं?”
  • नोटिस जारी: अदालत ने केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 को होगी।

याचिकाकर्ता के वकील के प्रमुख तर्क

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकीलों (विष्णु शंकर जैन व अन्य) ने कोर्ट के सामने नियमों की ‘संवैधानिक वैधता’ पर सवाल उठाए:

  1. सामान्य वर्ग की अनदेखी: वकील ने तर्क दिया कि नियम 3(c) के तहत ‘जाति-आधारित भेदभाव’ की परिभाषा केवल SC, ST और OBC तक सीमित कर दी गई है। इसमें सामान्य वर्ग (General Category) के छात्रों को किसी भी प्रकार के संरक्षण से बाहर रखा गया है, जो अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है।
  2. प्रति-आरोप का खतरा: दलील दी गई कि यदि कोई वरिष्ठ छात्र किसी कनिष्ठ (Junior) के साथ रैगिंग करता है, तो नए नियमों के तहत उसे जातिगत भेदभाव का रंग दिया जा सकता है, जिससे निर्दोष छात्रों का उत्पीड़न होगा।
  3. दंडात्मक प्रावधानों का अभाव: याचिकाकर्ता ने कहा कि ड्राफ्ट नियमों में ‘झूठी शिकायत’ करने पर दंड का प्रावधान था, जिसे अंतिम अधिसूचना में हटा दिया गया है। इससे फर्जी मामलों की बाढ़ आ सकती है।

क्या हैं विवादित 2026 के नियम?

यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को ये नियम अधिसूचित किए थे, जिनके मुख्य बिंदु इस प्रकार थे:

  • इक्विटी कमेटी (समता समिति): हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में एक 10-सदस्यीय कमेटी बनाना अनिवार्य था।
  • अनिवार्य प्रतिनिधित्व: इस कमेटी में SC, ST, OBC, दिव्यांग और महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य था, लेकिन सामान्य वर्ग के लिए कोई कोटा तय नहीं था।
  • कठोर कार्रवाई: नियमों का पालन न करने वाले संस्थानों के अनुदान (Grants) रोकने और उनकी मान्यता रद्द करने की चेतावनी दी गई थी।

“भारत की एकता हमारे संस्थानों में झलकनी चाहिए। ये नियम समावेशी होने के बजाय समाज को बांटने और प्रतिगामी परिणाम देने वाले प्रतीत होते हैं। हमें एक स्वतंत्र और निष्पक्ष माहौल चाहिए, न कि ऐसा तंत्र जो दुरुपयोग के लिए खुला हो।” — सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ

आगे की राह

सुप्रीम कोर्ट के इस स्टे के बाद अब कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को नए पैनल (Equity Committees) बनाने की प्रक्रिया रोकनी होगी। अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है, जिसे मार्च तक यह साबित करना होगा कि ये नियम भेदभावपूर्ण नहीं हैं और इनका उद्देश्य केवल पिछड़ों का संरक्षण करना है।

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