नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत ने आवारा कुत्तों के हमले से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए एक बड़ा आदेश जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति को सार्वजनिक स्थान पर आवारा कुत्ता काटता है, तो इसके लिए संबंधित राज्य सरकार और स्थानीय नगर निकाय (Municipal Body) जिम्मेदार होंगे और उन्हें पीड़ित को उचित मुआवजा देना होगा। कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि सड़कों पर नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन का मौलिक कर्तव्य है और वे अपनी विफलता का बोझ आम जनता पर नहीं डाल सकते।
अदालत का तर्क: ‘प्रशासन की लापरवाही का हर्जाना जनता क्यों भरे?’
न्यायमूर्ति की पीठ ने सुनवाई के दौरान प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल उठाए:
- सुरक्षा का अधिकार: कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को सुरक्षित जीवन जीने का अधिकार है। आवारा कुत्तों का सड़क पर हिंसक होना प्रशासन की विफलता को दर्शाता है।
- बजट और संसाधन: अदालत ने टिप्पणी की कि सरकारें पशु जन्म नियंत्रण (ABC) नियमों के नाम पर बजट तो खर्च करती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कुत्तों की संख्या और उनके व्यवहार में कोई सुधार नहीं दिख रहा है।
- जवाबदेही तय: अब तक ऐसे मामलों में जवाबदेही तय नहीं थी, लेकिन इस फैसले के बाद पीड़ित सीधे तौर पर राज्य सरकार से मुआवजे की मांग कर सकेंगे।
मुआवजे का आधार और प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजे के निर्धारण के लिए कुछ दिशा-निर्देश भी संकेतित किए हैं:
- चोट की गंभीरता: मुआवजे की राशि इस बात पर निर्भर करेगी कि कुत्ते के काटने से कितनी गहरी चोट आई है, इलाज में कितना खर्च हुआ है और क्या पीड़ित को कोई स्थाई विकलांगता हुई है।
- काम का नुकसान: यदि कुत्ते के काटने के कारण कोई व्यक्ति कई दिनों तक काम पर नहीं जा पाता है, तो सरकार को उसके वेतन या आय के नुकसान की भरपाई भी करनी होगी।
- मृत्यु की स्थिति: आवारा कुत्तों के हमले में बच्चों या वयस्कों की मृत्यु होने पर राज्य सरकार को भारी मुआवजा देना होगा, जैसा कि अन्य दुर्घटनाओं के मामलों में दिया जाता है।
स्थानीय निकायों को सख्त निर्देश
कोर्ट ने नगर निगमों और पालिकाओं को कुछ कड़े कदम उठाने का आदेश दिया है:
- नसबंदी और टीकाकरण: कुत्तों की नसबंदी और रेबीज रोधी टीकाकरण अभियान को युद्ध स्तर पर चलाने का निर्देश दिया गया है।
- डेटाबेस तैयार करना: प्रशासन को अपने क्षेत्र में आवारा कुत्तों की सटीक संख्या और उनके व्यवहार की निगरानी के लिए एक प्रभावी तंत्र बनाना होगा।
- शेल्टर होम्स की व्यवस्था: हिंसक या बीमार कुत्तों को सड़क से हटाकर सुरक्षित शेल्टर होम्स में भेजने की जिम्मेदारी अब नगर निकायों की होगी।
निष्कर्ष: आम आदमी को मिली कानूनी ढाल
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से नगर निगमों और राज्य सरकारों पर काम करने का दबाव बढ़ेगा। अब तक आवारा कुत्तों की समस्या को ‘कुदरती आपदा’ या ‘सामान्य बात’ मानकर नजरअंदाज किया जाता था, लेकिन अब आर्थिक दंड के डर से प्रशासन को सक्रिय होना पड़ेगा। यह फैसला देश के लाखों उन नागरिकों के लिए बड़ी राहत है जो हर दिन सड़कों पर डर के साये में चलने को मजबूर हैं।





