नैनीताल: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने सुखवंत सिंह आत्महत्या मामले की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। न्यायमूर्ति की एकल पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस जांच की प्रगति पर असंतोष जताया और सरकार को निर्देश दिया कि इस मामले में अब तक हुई कार्रवाई की विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट (Status Report) अदालत के समक्ष पेश की जाए। सुखवंत सिंह के परिजनों द्वारा दायर याचिका में आरोप लगाया गया था कि प्रभावशाली व्यक्तियों के दबाव के कारण पुलिस दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने से कतरा रही है, जिस पर अदालत ने अब कड़ा संज्ञान लिया है।
क्या है सुखवंत सिंह का मामला?
यह मामला कुछ समय पहले तब सुर्खियों में आया था जब सुखवंत सिंह नामक व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली थी:
- सुसाइड नोट का खुलासा: मृतक ने अपने पीछे छोड़े सुसाइड नोट में कुछ प्रभावशाली लोगों और स्थानीय भू-माफियाओं पर मानसिक उत्पीड़न और आर्थिक शोषण के गंभीर आरोप लगाए थे।
- पुलिस की भूमिका पर सवाल: परिजनों का आरोप है कि नामजद एफआईआर दर्ज होने के बावजूद मुख्य आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हुई और पुलिस केवल खानापूर्ति कर रही है।
- न्याय की गुहार: पुलिस से उचित सहयोग न मिलने पर पीड़ित परिवार ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और मामले की निष्पक्ष जांच (संभवतः सीबीआई या विशेष जांच दल से) कराने की मांग की।
हाईकोर्ट द्वारा सरकार को दिए गए मुख्य आदेश
सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन के लिए निम्नलिखित दिशा-निर्देश जारी किए:
- जांच रिपोर्ट तलब: अदालत ने सरकार से पूछा है कि सुसाइड नोट में दर्ज नामों पर अब तक क्या कार्रवाई की गई और आरोपियों से पूछताछ का क्या नतीजा निकला।
- साक्ष्यों की सुरक्षा: हाईकोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया कि मामले से जुड़े सभी डिजिटल और दस्तावेजी साक्ष्यों को सुरक्षित रखा जाए ताकि जांच में किसी प्रकार की छेड़छाड़ न हो सके।
- समय सीमा का निर्धारण: सरकार को अगली सुनवाई की तारीख तक अपना पक्ष रखने और जांच की वर्तमान स्थिति स्पष्ट करने का अंतिम अवसर दिया गया है।
परिजनों के आरोप और कानूनी दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत में दलील दी कि सुखवंत सिंह को अपनी जमीन और संपत्ति के विवाद में इस कदर प्रताड़ित किया गया कि उनके पास जीवन समाप्त करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यदि स्थानीय पुलिस दबाव में काम कर रही है, तो मामले को किसी स्वतंत्र एजेंसी को स्थानांतरित कर देना चाहिए ताकि सच सामने आ सके।
निष्कर्ष: न्याय की उम्मीद
हाईकोर्ट के दखल के बाद अब इस मामले में तेजी आने की उम्मीद है। सुखवंत सिंह के समर्थकों और परिजनों ने अदालत के इस कदम का स्वागत किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ‘सुसाइड के लिए उकसाने’ (Abetment to Suicide) के मामलों में अक्सर प्रभावशाली लोगों के शामिल होने के कारण जांच प्रभावित होती है, लेकिन हाईकोर्ट की निगरानी से इस केस में पारदर्शिता बनी रहेगी।





