Sunday, November 30, 2025

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सीजेआई पर जूता फेंकने वाले वकील का बयान: ‘मुझे कोई अफसोस नहीं, सनातन धर्म का मज़ाक उड़ाया गया’

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बी.आर. गवई पर जूता उछालने की कोशिश करने वाले वकील राकेश किशोर ने चौंकाने वाला बयान दिया है। निलंबित वकील राकेश किशोर ने कहा है कि उन्हें अपने किए पर न कोई अफसोस है और न ही पछतावा, क्योंकि उन्होंने जो किया वह “भावनात्मक प्रतिक्रिया” थी। उन्होंने दावा किया कि वे सीजेआई की टिप्पणी से गहराई से आहत हुए थे।
राकेश किशोर ने मीडिया से बातचीत में कहा, “मैं नशे में नहीं था, मैं पूरी तरह सचेत था। यह मेरी नाराजगी की प्रतिक्रिया थी। मैं न डरा हूं और न ही मुझे कोई पछतावा है। जब भी सनातन धर्म से जुड़े मामलों की सुनवाई होती है, तो सुप्रीम कोर्ट उसी तरह के आदेश देता है। 16 सितंबर को मुख्य न्यायाधीश की अदालत में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई थी, जिस पर सुनवाई के दौरान सीजेआई ने मजाकिया लहजे में कहा था— ‘जाओ और मूर्ति से प्रार्थना करो कि वह तुम्हारा सिर वापस लगा दे।’ यह टिप्पणी अपमानजनक थी और मैं उसी से आहत हुआ।”
वकील ने कहा कि न्यायालय को भले ही याचिकाकर्ता को राहत देने की आवश्यकता न हो, लेकिन ‘किसी के विश्वास या धर्म का मजाक नहीं उड़ाया जाना चाहिए।’ उन्होंने कहा कि यह मामला केवल एक टिप्पणी का नहीं बल्कि “सनातन की मर्यादा और न्यायपालिका की गरिमा” से जुड़ा है।
राकेश किशोर ने कहा, “सीजेआई जैसे उच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को अपने शब्दों की गंभीरता समझनी चाहिए। ‘माई लॉर्ड’ कहने का जो भाव है, वह केवल सम्मान का नहीं, बल्कि न्याय की निष्पक्षता का प्रतीक है। इस गरिमा को बनाए रखना न्यायपालिका की ज़िम्मेदारी है।”
उन्होंने आगे कहा, “आप मॉरीशस जाते हैं और वहां कहते हैं कि देश बुलडोजर से नहीं चलेगा। तो मैं पूछना चाहता हूं— जब उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकारी संपत्ति पर अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करते हैं, तो क्या वह गलत है? क्या यह न्याय की रक्षा नहीं है?”
सुप्रीम कोर्ट परिसर में हुई इस घटना के बाद वकील राकेश किशोर को निलंबित कर दिया गया है। अदालत की कार्यवाही के दौरान सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें तत्काल हिरासत में लिया और बाद में उन्हें अदालत से बाहर ले जाया गया।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह घटना न्यायपालिका की गरिमा और शालीनता के लिए गंभीर चिंता का विषय है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने मामले का संज्ञान लेते हुए कहा है कि न्यायालय में हिंसात्मक व्यवहार या किसी प्रकार की आक्रामकता को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
वहीं, सुप्रीम कोर्ट के सूत्रों का कहना है कि अदालत की मर्यादा भंग करने वाले ऐसे कृत्यों पर कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।

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