अनंतनाग/श्रीनगर: “वादे किए जाते हैं निभाने के लिए, लेकिन जब बात किसी शहीद या आतंकी हमले के पीड़ित परिवार की हो, तो सरकारी फाइलों की सुस्ती जख्मों पर नमक छिड़कने का काम करती है।” यह दर्द है उस बेटी का, जिसने 10 महीने पहले पहलगाम में हुए आतंकी हमले में अपने पिता को खो दिया था। हमले के बाद शासन-प्रशासन के बड़े अधिकारियों और राजनेताओं ने पीड़ित परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की थी और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का लिखित व मौखिक आश्वासन दिया था। लेकिन आज, लगभग एक साल बीत जाने के बाद भी वह वादा सरकारी दफ्तरों की धूल फांक रहा है और पीड़ित की बेटी न्याय की उम्मीद में दर-दर की ठोकरें खा रही है।
दहशत का वो दिन और खोखले आश्वासन
10 महीने पहले दक्षिण कश्मीर के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल पहलगाम में आतंकियों ने अंधाधुंध गोलीबारी की थी, जिसमें एक नागरिक की जान चली गई थी:
- एकमात्र सहारा छिना: मृतक परिवार का इकलौता कमाने वाला सदस्य था। उनकी मृत्यु के बाद परिवार के सामने आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया।
- नेताओं का जमावड़ा: घटना के तुरंत बाद कई वरिष्ठ नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों ने घर पहुँचकर सांत्वना दी थी। उस वक्त आश्वासन दिया गया था कि बेटी की योग्यता के अनुसार उसे तत्काल प्रभाव से सरकारी सेवा में लिया जाएगा।
- फाइलों में कैद भविष्य: परिवार का आरोप है कि शुरुआती हफ्तों के बाद किसी भी अधिकारी ने उनकी सुध नहीं ली।
बेटी की गुहार: ‘डिग्रियां हाथ में हैं, पर चूल्हा जलाना मुश्किल’
पीड़ित की बेटी, जो उच्च शिक्षित है, ने अपनी व्यथा साझा करते हुए प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं:
- कार्यालयों के चक्कर: पिछले 10 महीनों में उसने तहसील कार्यालय से लेकर सचिवालय तक दर्जनों चक्कर लगाए हैं, लेकिन हर बार उसे ‘प्रक्रिया जारी है’ कहकर वापस भेज दिया जाता है।
- आर्थिक तंगी: पिता के जाने के बाद घर की आर्थिक स्थिति बदतर हो गई है। संचित जमा पूंजी खत्म हो चुकी है और अब बुनियादी जरूरतों के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है।
- मानसिक पीड़ा: बेटी का कहना है कि एक तरफ पिता को खोने का गम है और दूसरी तरफ सरकार की वादाखिलाफी से होने वाली मानसिक प्रताड़ना ने परिवार को तोड़कर रख दिया है।
प्रशासन का पक्ष: ‘प्रक्रियाधीन है मामला’
जब इस संबंध में संबंधित विभाग के अधिकारियों से संपर्क किया गया, तो उन्होंने हमेशा की तरह वही रटा-रटाया जवाब दिया:
- सत्यापन में देरी: अधिकारियों का तर्क है कि अनुकंपा के आधार पर दी जाने वाली नियुक्तियों (Compassionate Appointment) के लिए विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों से क्लीयरेंस और दस्तावेजों का सत्यापन अनिवार्य है, जिसमें समय लगता है।
- आश्वासन: प्रशासन ने एक बार फिर भरोसा दिलाया है कि मामला ‘अंतिम चरण’ में है और जल्द ही नियुक्ति पत्र जारी कर दिया जाएगा।





