Wednesday, March 4, 2026

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सालाना 77 लाख टन कार्बन उत्सर्जन… फिर भी अस्पतालों में हरित ऊर्जा की रफ्तार धीमी

भारत के अस्पताल कार्बन उत्सर्जन के बड़े केंद्र बन चुके हैं। राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार देशभर के दो लाख से अधिक सरकारी और निजी अस्पताल हर घंटे औसतन 97 लाख मेगावाट बिजली खपत करते हैं। इसी वजह से सालाना लगभग 77 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा दौर में जब जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया के लिए गंभीर संकट है, तब अस्पतालों में हरित ऊर्जा को अपनाना अब विकल्प नहीं बल्कि मजबूरी बन चुका है।

कासगंज से मिसाल

उत्तर प्रदेश के वंचित जिलों में शुमार कासगंज इसका ताज़ा उदाहरण है। यहाँ का जिला अस्पताल अब हरित ऊर्जा से संचालित होने की ओर बढ़ रहा है। अस्पताल में एलईडी लाइटें, एसी, पानी को ठंडा-गर्म करने की मशीनें तक सौर ऊर्जा से चलेंगी। दिल्ली से लगभग 200 किलोमीटर दूर स्थित इस अस्पताल के साथ-साथ आसपास के स्वास्थ्य केंद्रों में भी नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ रहा है।
सोरों सूकर क्षेत्र स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र इसका उदाहरण है। यहाँ 5 किलोवाट क्षमता का सौर संयंत्र लगाया गया है। चिकित्सा अधिकारी डॉ. मुकेश कुमार बताते हैं, “अब हमें बिजली कटौती की चिंता नहीं रहती। चाहे कंप्यूटर का इस्तेमाल हो या प्रिंट निकालना, सब सुचारू रूप से चल रहा है। पहले बैकअप सिस्टम पर निर्भर रहना पड़ता था, जो कुछ ही घंटों में ठप हो जाता था।”

पहल तो 2019 से, लेकिन रफ्तार धीमी

दरअसल, 2019 से ही देश के अधिकांश राज्यों में अस्पतालों को नवीकरणीय ऊर्जा से जोड़ने की कवायद चल रही है। लेकिन अब तक किसी भी राज्य में 100 प्रतिशत हरित अस्पताल नहीं बन पाए। यह स्थिति तब है जब मौजूदा समय में जलवायु परिवर्तन के चलते मौसम की चरम घटनाएँ और बिजली कटौती सीधे स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावित कर रही हैं।

क्यों जरूरी है हरित अस्पताल?

भारत के तत्कालीन स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ. अतुल गोयल ने नवंबर 2024 में अपने पत्र में स्पष्ट किया था कि जलवायु संकट का असर स्वास्थ्य सेवाओं पर गहरा पड़ रहा है। “अगर अस्पताल खुद ही बिजली पर इतना निर्भर रहेंगे और कार्बन उत्सर्जन करते रहेंगे, तो मरीजों की देखभाल भी प्रभावित होगी। इसलिए नवीकरणीय ऊर्जा का अधिकतम उपयोग अनिवार्य है,” उन्होंने कहा।

मंत्रालय का पक्ष

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे महानगरों में हरित ऊर्जा अपनाने की पहल अभी सीमित है। लेकिन ग्रामीण और अर्द्धशहरी इलाकों में सौर ऊर्जा आधारित स्वास्थ्य केंद्र धीरे-धीरे उभर रहे हैं। अधिकारी मानते हैं कि रफ्तार धीमी है, लेकिन प्रयास जारी हैं। “कस्बाई और ग्रामीण क्षेत्रों के अस्पताल पारंपरिक बिजली मॉडल पर ही निर्भर हैं। इन्हें जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाने में समय और निवेश दोनों की ज़रूरत है,” उन्होंने कहा।

निष्कर्ष

स्पष्ट है कि भारत के अस्पतालों में हरित ऊर्जा का दायरा बढ़ा तो है, लेकिन रफ्तार बेहद सुस्त है। जबकि सालाना करोड़ों यूनिट बिजली की खपत और लाखों टन कार्बन उत्सर्जन को देखते हुए यह बदलाव न केवल ज़रूरी है बल्कि अनिवार्य भी। सवाल है कि क्या आने वाले वर्षों में अस्पताल इस चुनौती का सामना करने के लिए हरित ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़ पाएंगे?

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