नैनीताल/देहरादून: प्रकृति के चक्र में आए बदलाव और ग्लोबल वार्मिंग का सीधा असर अब बेजुबान पक्षियों पर दिखने लगा है। हर साल सर्दियों के मौसम में साइबेरिया, मंगोलिया और मध्य एशिया के ठंडे प्रदेशों से हजारों मील का सफर तय कर भारत आने वाले प्रवासी पक्षियों की आमद इस बार बेहद कम रही है। पर्यावरणविदों और पक्षी प्रेमियों के अनुसार, हिमालयी क्षेत्रों में इस वर्ष समय पर और पर्याप्त बर्फबारी न होना इसकी सबसे बड़ी वजह है। बर्फबारी की कमी के कारण पहाड़ों और मैदानों के तापमान में वह गिरावट नहीं आई, जो इन पक्षियों को प्रवास के लिए प्रेरित करती है। इसके परिणामस्वरूप, पक्षियों का सदियों पुराना ‘माइग्रेशन चक्र’ (प्रवास चक्र) बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
प्रमुख कारण: क्यों नहीं आए ‘विदेशी मेहमान’?
पक्षी विशेषज्ञों ने इस साल पक्षियों के न आने के पीछे निम्नलिखित मुख्य कारण बताए हैं:
- तापमान में असामान्य वृद्धि: इस साल दिसंबर और जनवरी के महीनों में भी कई क्षेत्रों में तापमान सामान्य से अधिक रहा। जब उत्तर की ओर कड़ाके की ठंड और बर्फबारी होती है, तभी ये पक्षी भोजन की तलाश में दक्षिण (भारत) की ओर रुख करते हैं।
- भोजन का संकट: बर्फबारी न होने से झीलों और जलाशयों का पानी नहीं जमा, जिससे वहां के इकोसिस्टम में मिलने वाले विशिष्ट शैवाल और कीड़े-मकोड़े विकसित नहीं हो पाए जो इन पक्षियों का मुख्य आहार हैं।
- बदलता ‘नेविगेशन’ रूट: विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण कई पक्षियों ने अपने रास्ते बदल लिए हैं या वे उन ठंडे इलाकों में ही रुक गए हैं जहाँ अब उतनी ठंड नहीं पड़ रही।
जलाशयों में सन्नाटा: इन प्रजातियों की कमी खली
उत्तराखंड के आसन बैराज, नैनीताल की झीलें और उत्तर प्रदेश के वेटलैंड्स में इस बार कई प्रजातियां नजर नहीं आ रही हैं:
- सुरखाब (Ruddy Shelduck): नारंगी-भूरे रंग का यह खूबसूरत पक्षी इस बार बहुत कम संख्या में देखा गया है।
- बार-हेडेड गूज (Bar-headed Goose): दुनिया की सबसे ऊंची उड़ान भरने वाले ये पक्षी इस साल अपने नियमित ठिकानों से गायब हैं।
- मल्लार्ड और पिंटेल: बत्तखों की इन प्रजातियों की संख्या में भी 40 से 50 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई है।
पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) पर खतरा
प्रवासी पक्षियों का न आना केवल देखने में बुरा नहीं है, बल्कि इसके गंभीर वैज्ञानिक परिणाम भी हैं:
- कीट नियंत्रण: ये पक्षी खेतों और जलाशयों के हानिकारक कीटों को खाकर प्राकृतिक संतुलन बनाए रखते हैं।
- बीज प्रसार: पक्षी अपने प्रवास के दौरान हजारों किलोमीटर तक बीजों का प्रसार करते हैं, जिससे वनस्पतियों की नई प्रजातियां विकसित होती हैं।
- पर्यटन को झटका: पक्षी प्रेमियों और ‘बर्ड वाचर्स’ के न आने से स्थानीय पर्यटन व्यवसाय पर भी बुरा असर पड़ा है।
निष्कर्ष: मानवता के लिए चेतावनी
प्रवासी पक्षियों के व्यवहार में आया यह बदलाव इस बात का प्रमाण है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की बात नहीं, बल्कि वर्तमान की हकीकत है। यदि बर्फबारी और बारिश का पैटर्न इसी तरह बिगड़ता रहा, तो आने वाले समय में हिमालयी जैव-विविधता का यह सुनहरा अध्याय हमेशा के लिए समाप्त हो सकता है।





