ब्रसेल्स/वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति और चीन सहित कई देशों पर लगाए गए भारी आयात शुल्क (Tariff) ने वैश्विक बाजार में एक बड़ी हलचल पैदा कर दी है। इस बीच, यूरोपीय संघ के शीर्ष नीति निर्माताओं और व्यापार विशेषज्ञों ने एक स्वर में स्वीकार किया है कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में भारत की भूमिका ‘बेहद जरूरी’ हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के टैरिफ वार से जहाँ चीन और यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ेगा, वहीं भारत के लिए यह एक ‘स्वर्ण अवसर’ साबित हो सकता है। यूरोपीय संघ ने माना है कि सप्लाई चेन को सुरक्षित रखने और चीन पर निर्भरता कम करने के लिए भारत अब एकमात्र भरोसेमंद विकल्प बनकर उभरा है।
ट्रंप के टैरिफ से भारत को कैसे होगा फायदा?
अमेरिकी प्रशासन की नई शुल्क नीति भारत के लिए कई मोर्चों पर सकारात्मक परिणाम ला सकती है:
- चीन प्लस वन रणनीति: अमेरिका द्वारा चीनी उत्पादों पर 60% तक टैरिफ लगाने की संभावना के बाद, अमेरिकी कंपनियां अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स को चीन से हटाकर भारत लाने की तैयारी में हैं।
- सस्ता निर्यात: यदि अमेरिका अन्य प्रतिद्वंद्वी देशों पर अधिक कर लगाता है और भारत के साथ व्यापारिक रियायतें बरकरार रखता है, तो अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान अधिक प्रतिस्पर्धी और सस्ता हो जाएगा।
- प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में उछाल: वैश्विक निवेशक अब यूरोप और चीन के बजाय भारत के स्थिर बाजार को अधिक सुरक्षित मान रहे हैं, जिससे भारत में बड़े निवेश की संभावना बढ़ गई है।
यूरोपीय संघ का बदला रुख: लोहा मानने पर क्यों हुआ मजबूर?
यूरोपीय संघ, जो पहले व्यापारिक मुद्दों पर भारत के साथ कड़ा रुख अपनाता था, अब सहयोग की बात कर रहा है:
- सप्लाई चेन का विविधीकरण: रूस-यूक्रेन युद्ध और चीन के साथ बढ़ते तनाव के बाद यूरोप को अपनी ऊर्जा और औद्योगिक सप्लाई चेन के लिए एक मजबूत साथी की तलाश है, जिसमें भारत फिट बैठता है।
- आईटी और सेवा क्षेत्र: यूरोपीय संघ ने माना है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था और एआई (AI) के क्षेत्र में भारत के बिना कोई भी वैश्विक गठबंधन अधूरा है।
- मुक्त व्यापार समझौता (FTA): भारत और यूरोपीय संघ के बीच लंबित एफटीए को लेकर अब यूरोपीय देशों में अधिक उत्सुकता देखी जा रही है, ताकि अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव को संतुलित किया जा सके।
भारत की बढ़ती आर्थिक धमक: मुख्य कारक
भारत की इस सफलता के पीछे उसकी आंतरिक नीतियां और वैश्विक स्थिति का बड़ा हाथ है:
- उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI): सरकार की पीएलआई योजनाओं ने मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर क्षेत्र में भारत को एक ग्लोबल हब बना दिया है।
- विशाल घरेलू बाजार: भारत का बढ़ता मध्य वर्ग दुनिया भर की कंपनियों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण बना हुआ है।
- रणनीतिक स्वायत्तता: भारत ने जिस तरह से अमेरिका और रूस-चीन ब्लॉक के बीच अपना संतुलन बनाए रखा है, उसने यूरोपीय देशों को भारत की कूटनीतिक परिपक्वता का कायल बना दिया है।
यूरोपीय संघ का यह मानना कि “इंडिया बेहद जरूरी है”, इस बात का संकेत है कि अब वैश्विक व्यापार का केंद्र पश्चिम से पूर्व की ओर खिसक रहा है। ट्रंप के टैरिफ यदि दुनिया के लिए चुनौती हैं, तो भारत के लिए वे एक ऐसी सीढ़ी हैं जो उसे दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने की राह आसान कर सकती है। भारत अब केवल एक बाजार नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार के नियम तय करने वाला एक निर्णायक खिलाड़ी बन चुका है।





