नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया है कि किसी विदेशी नागरिक की राष्ट्रीयता की पुष्टि और उसके मूल देश की स्वीकृति के बिना उसे भारत से निर्वासित (डिपोर्ट) नहीं किया जा सकता। गृह मंत्रालय ने अदालत में दाखिल हलफनामे में स्पष्ट किया कि जब तक संबंधित देश उस व्यक्ति को अपना नागरिक स्वीकार नहीं करता और आवश्यक यात्रा दस्तावेज जारी नहीं करता, तब तक निर्वासन की प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकती।
यह हलफनामा असम में विदेशी घोषित किए गए उन लोगों की अनिश्चितकालीन हिरासत से जुड़ी याचिका पर दायर किया गया है, जिनकी राष्ट्रीयता अब तक सत्यापित नहीं हो सकी है। केंद्र ने कहा कि किसी भी विदेशी नागरिक को उसके मूल देश भेजने के लिए पहले उसकी नागरिकता का सत्यापन आवश्यक है। इसके बाद संबंधित देश के दूतावास या उच्चायोग से यात्रा दस्तावेज प्राप्त किए जाते हैं और तभी निर्वासन की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
गृह मंत्रालय के अनुसार, सामान्य परिस्थितियों में किसी विदेशी नागरिक को उसकी सजा पूरी होने या न्यायिक प्रक्रिया समाप्त होने के बाद संबंधित राज्य सरकार, केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन अथवा विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय (FRRO) द्वारा निर्वासित किया जा सकता है, बशर्ते उसके पास वैध पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज हों और उसके खिलाफ कोई अन्य आपराधिक मामला लंबित न हो।
केंद्र ने अदालत को यह भी बताया कि यदि किसी व्यक्ति के पास वैध यात्रा दस्तावेज नहीं हैं, तो विदेश मंत्रालय के माध्यम से संबंधित देश के दूतावास से संपर्क कर उसकी राष्ट्रीयता का सत्यापन कराया जाता है। चूंकि यह प्रक्रिया पूरी तरह संबंधित विदेशी सरकार के सहयोग पर निर्भर करती है, इसलिए इसकी कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं की जा सकती।
सरकार ने कहा कि जब तक राष्ट्रीयता की पुष्टि नहीं हो जाती और निर्वासन संभव नहीं हो जाता, तब तक ऐसे विदेशी नागरिकों की आवाजाही को कानून के तहत नियंत्रित रखना आवश्यक है। इसका उद्देश्य उनके फरार होने की आशंका को रोकना, राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना और भविष्य में निर्वासन की प्रक्रिया को प्रभावी ढंग से पूरा करना है।





