जयपुर: राजस्थान की राजनीति और पंचायती राज व्यवस्था में एक युग का अंत हो गया है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की कैबिनेट ने राज्य में पिछले तीन दशकों से लागू ‘दो बच्चों की अनिवार्यता’ के नियम को समाप्त करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। इस फैसले के बाद अब वे ग्रामीण नागरिक भी पंचायती राज चुनावों (सरपंच, पंच, पार्षद आदि) में अपनी किस्मत आजमा सकेंगे, जिनकी तीन या उससे अधिक संतानें हैं। वर्ष 1994 से लागू इस कठोर नियम के हटने से प्रदेश के लाखों लोगों को बड़ी राहत मिली है, जो अब तक चुनाव लड़ने की पात्रता से वंचित थे।
क्या था 30 साल पुराना नियम?
भैरों सिंह शेखावत सरकार के कार्यकाल के दौरान, जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ‘राजस्थान पंचायती राज अधिनियम 1994’ लाया गया था:
- पात्रता की शर्त: इस कानून के तहत प्रावधान था कि 27 नवंबर 1995 के बाद जिस व्यक्ति की दो से अधिक संतानें होंगी, वह पंचायत चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य माना जाएगा।
- विवाद और अदालती मामले: इस नियम के कारण पिछले 30 वर्षों में हजारों निर्वाचित प्रतिनिधियों को पद से हाथ धोना पड़ा और अदालतों में फर्जी जन्म प्रमाण पत्रों के अनगिनत मामले लंबित रहे।
- भेदभाव का आरोप: लंबे समय से यह मांग उठ रही थी कि जब सांसद और विधायक (MP/MLA) के लिए ऐसा कोई नियम नहीं है, तो केवल पंचायत प्रतिनिधियों पर ही यह पाबंदी क्यों।
कैबिनेट के इस फैसले के मायने
राजस्थान मंत्रिमंडल की बैठक में इस संशोधन को मंजूरी दी गई, जिसके पीछे सरकार ने कई तर्क दिए हैं:
- लोकतांत्रिक समानता: सरकार का मानना है कि चुनाव लड़ने का अधिकार सभी को समान रूप से मिलना चाहिए। उच्च सदन और विधानसभा के लिए कोई संतान प्रतिबंध न होना और निचले स्तर पर होना विरोधाभासी था।
- पलायन और सामाजिक दबाव पर रोक: इस नियम के डर से कई लोग बच्चों को गोद दे देते थे या जन्म रिकॉर्ड छिपाते थे। अब इस तरह की सामाजिक विसंगतियों पर लगाम लगेगी।
- युवाओं को मौका: ग्रामीण क्षेत्रों में कई सक्रिय युवा नेता इस तकनीकी बाधा के कारण नेतृत्व से दूर थे, जिन्हें अब मुख्यधारा में आने का अवसर मिलेगा।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया
इस फैसले के साथ ही राजस्थान में चुनावी सरगर्मियां तेज हो गई हैं:
- विपक्ष का रुख: हालांकि विपक्ष ने इस पर मिली-जुली प्रतिक्रिया दी है, लेकिन अधिकांश राजनीतिक दलों ने इसे व्यावहारिक कदम बताया है।
- जनता में उत्साह: विशेष रूप से ग्रामीण अंचलों में इस फैसले का स्वागत हो रहा है। लोगों का कहना है कि अब केवल संतान संख्या के आधार पर योग्य उम्मीदवार को चुनाव से बाहर नहीं रखा जा सकेगा।
- जनसंख्या नीति पर सवाल: कुछ विशेषज्ञों ने चिंता जताई है कि इस नियम के हटने से जनसंख्या नियंत्रण के संदेश में कमी आ सकती है, हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि अन्य माध्यमों से जागरूकता जारी रहेगी।





