तिरुवनंतपुरम: भारत की सैन्य शक्ति का प्रतीक और दुनिया की सबसे घातक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ‘ब्रह्मोस’ (BrahMos) के निर्माण का दायरा अब और विस्तृत होने जा रहा है। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए केरल सरकार ने राज्य में ब्रह्मोस मिसाइल की एक अत्याधुनिक प्रोडक्शन यूनिट (उत्पादन इकाई) स्थापित करने का निर्णय लिया है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए राज्य सरकार ने तिरुवनंतपुरम के पास 100 एकड़ जमीन आवंटित कर दी है। यह कदम न केवल भारत की रक्षा तैयारियों को मजबूती देगा, बल्कि केरल के औद्योगिक मानचित्र पर एक मील का पत्थर भी साबित होगा।
परियोजना का विवरण: ब्रह्मोस एयरोस्पेस और केरल का साझा विजन
इस नई इकाई की स्थापना ‘ब्रह्मोस एयरोस्पेस’ (भारत के DRDO और रूस के NPOM का संयुक्त उपक्रम) के माध्यम से की जाएगी:
- भूमि आवंटन: केरल सरकार ने तिरुवनंतपुरम के पल्लीपुरम (Pallippuram) इलाके में इस इकाई के लिए 100 एकड़ भूमि को मंजूरी दी है।
- मिसाइल असेंबली: इस यूनिट में ब्रह्मोस मिसाइल के विभिन्न घटकों (Components) का निर्माण और उनकी असेंबली की जाएगी। विशेष रूप से मिसाइल के आधुनिक संस्करणों पर यहाँ काम होने की उम्मीद है।
- केरल एयरोस्पेस पार्क: इस इकाई को एक बड़े ‘एयरोस्पेस और डिफेंस पार्क’ के हिस्से के रूप में विकसित किया जा रहा है, जिससे आसपास के अन्य लघु उद्योगों को भी सहयोग मिलेगा।
आर्थिक और तकनीकी लाभ: हजारों रोजगार के अवसर
केरल में इस इकाई के आने से राज्य की आर्थिकी और तकनीकी कौशल में भारी सुधार होगा:
- प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार: इस परियोजना से राज्य के सैकड़ों कुशल इंजीनियरों, तकनीशियनों और हजारों श्रमिकों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलेगा।
- स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला: ब्रह्मोस यूनिट की जरूरतों को पूरा करने के लिए कई छोटी एमएसएमई (MSME) इकाइयां विकसित होंगी, जिससे स्थानीय स्तर पर व्यापार को बढ़ावा मिलेगा।
- कौशल विकास: रक्षा क्षेत्र की उच्च तकनीक पर काम होने से केरल के युवाओं को वैश्विक स्तर का अनुभव प्राप्त होगा।
रणनीतिक महत्व: भारत की बढ़ती निर्यात क्षमता
ब्रह्मोस मिसाइल की मांग अब केवल भारतीय सेना तक सीमित नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी भारी मांग है:
- निर्यात का केंद्र: भारत ने फिलीपींस जैसे देशों को ब्रह्मोस निर्यात करना शुरू कर दिया है। केरल की यह यूनिट भारत की बढ़ती निर्यात प्रतिबद्धताओं को समय पर पूरा करने में सहायक होगी।
- अत्याधुनिक तकनीक: यहाँ ब्रह्मोस के छोटे संस्करण (BrahMos-NG) पर भी काम हो सकता है, जिसे सुखोई-30 एमकेआई जैसे लड़ाकू विमानों से आसानी से दागा जा सकेगा।





