Sunday, February 8, 2026

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मिडल-ईस्ट को महायुद्ध से बचाने की कवायद: ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमले रोकने के लिए अरब देश एकजुट

रियाद/काहिरा: मध्य पूर्व में संभावित तबाही को रोकने के लिए अरब जगत के शक्तिशाली देशों ने एक साझा कूटनीतिक ढाल तैयार की है। सूत्रों के अनुसार, सऊदी अरब, मिस्र, कतर और ओमान ने संयुक्त रूप से वाशिंगटन और तेहरान को यह स्पष्ट संदेश दिया है कि वे अपने क्षेत्र को किसी भी बड़े सैन्य संघर्ष का अखाड़ा नहीं बनने देंगे। इन देशों की रणनीति का मुख्य उद्देश्य अमेरिका को ईरान पर किसी भी बड़े सीधे हमले से रोकना और ईरान को संयम बरतने के लिए राजी करना है। अरब देशों को डर है कि यदि ईरान पर हमला होता है, तो पूरा क्षेत्र अस्थिर हो जाएगा, जिसका सीधा असर तेल की आपूर्ति और उनकी अपनी सुरक्षा पर पड़ेगा।

चार देशों की अलग-अलग कूटनीतिक भूमिकाएं

इस ‘शांति मिशन’ में प्रत्येक देश अपनी विशिष्ट स्थिति का उपयोग कर रहा है:

  • सऊदी अरब (शांति का दूत): सऊदी अरब ने ईरान के साथ अपने हालिया सुधरे संबंधों का उपयोग करते हुए यह स्पष्ट किया है कि वह अपने हवाई क्षेत्र का उपयोग ईरान पर हमले के लिए नहीं होने देगा। रियाद की प्राथमिकता अपनी ‘विजन 2030’ आर्थिक योजनाओं को युद्ध की आंच से बचाना है।
  • कतर (मध्यस्थ की भूमिका): दोहा वर्तमान में अमेरिका और ईरान के बीच सबसे बड़ा ‘बैकचैनल’ बना हुआ है। कतर दोनों देशों के बीच संदेशों का आदान-प्रदान कर रहा है ताकि किसी भी गलतफहमी के कारण युद्ध न छिड़ जाए।
  • मिस्र (क्षेत्रीय संतुलन): काहिरा लगातार इजरायल और अमेरिका के संपर्क में है। मिस्र को डर है कि युद्ध की स्थिति में स्वेज नहर से होने वाला व्यापार ठप हो जाएगा और शरणार्थियों का संकट खड़ा होगा।
  • ओमान (गोपनीय वार्ता): मस्कट पारंपरिक रूप से ईरान और पश्चिम के बीच ‘गुपचुप’ वार्ताओं का केंद्र रहा है। ओमान के अधिकारी तेहरान के साथ तनाव कम करने के लिए सीधी बातचीत कर रहे हैं।

अरब देशों की एकजुटता के पीछे के 3 बड़े कारण

विशेषज्ञों के अनुसार, इन देशों का एकजुट होना केवल शांति प्रेम नहीं, बल्कि रणनीतिक मजबूरी भी है:

  1. आर्थिक स्थिरता: एक भी मिसाइल हमला खाड़ी देशों के शेयर बाजारों को धराशायी कर सकता है और तेल निर्यात को बाधित कर सकता है।
  2. ऊर्जा सुरक्षा: ईरान के पास होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को बंद करने की क्षमता है, जो दुनिया की तेल सप्लाई की लाइफलाइन है।
  3. आतंकवाद का खतरा: युद्ध की स्थिति में कट्टरपंथी समूहों के दोबारा सक्रिय होने का डर है, जो इन अरब राजशाहियों के लिए आंतरिक खतरा पैदा कर सकते हैं।

अमेरिका और इजरायल पर दबाव

अरब देशों का यह साझा रुख अमेरिका के लिए एक बड़ी चुनौती है। यदि सऊदी और कतर जैसे सहयोगी देश अपने सैन्य अड्डों के उपयोग की अनुमति नहीं देते हैं, तो अमेरिका के लिए ईरान के भीतर सैन्य कार्रवाई करना सामरिक रूप से बेहद कठिन हो जाएगा। वहीं, इजरायल को भी यह संदेश दिया गया है कि क्षेत्रीय सहयोग के बिना वह लंबी जंग नहीं जीत सकता।

 

फिलहाल, मध्य पूर्व ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति में है। अरब देशों की यह एकजुटता यह दर्शाती है कि क्षेत्र अब बाहरी शक्तियों के युद्ध का मोहरा बनने को तैयार नहीं है। हालांकि, ईरान के अगले कदम और इजरायल की जवाबी कार्रवाई पर ही इस कूटनीति की सफलता निर्भर करेगी। अगले 72 घंटे इस क्षेत्र के भविष्य के लिए निर्णायक माने जा रहे हैं।

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