Saturday, January 31, 2026

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महाराष्ट्र निकाय चुनाव: ठाणे और मुंबई के बेल्ट में ‘मराठी मानुस’ का मुद्दा बेअसर; 80 गैर-मराठी उम्मीदवारों ने जीती पार्षद की कुर्सी, ठाकरे बंधुओं को लगा झटका

मुंबई: महाराष्ट्र के हालिया निकाय चुनावों के नतीजों ने क्षेत्रीय राजनीति के पुराने समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है। शिवसेना (यूबीटी) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ने चुनाव प्रचार के दौरान जिस ‘मराठी अस्मिता’ और ‘मराठी कार्ड’ पर दांव लगाया था, वह इस बार मतदाताओं को लुभाने में विफल रहा। इसके उलट, राज्य के विभिन्न निकायों में 80 गैर-मराठी उम्मीदवारों ने शानदार जीत दर्ज कर पार्षद (कॉरपोरेटर) के रूप में अपनी जगह पक्की की है। इन विजेताओं में बड़ी संख्या उत्तर भारतीय, गुजराती और दक्षिण भारतीय मूल के नेताओं की है। यह रुझान स्पष्ट करता है कि शहरी क्षेत्रों में मतदाता अब केवल भाषाई आधार पर नहीं, बल्कि विकास और समावेशी राजनीति के नाम पर वोट दे रहे हैं।

बदलते जनसांख्यिकीय समीकरण और चुनावी नतीजे

निकाय चुनावों के इन परिणामों ने ठाकरे बंधुओं की ‘मराठी मानुस’ वाली राजनीति के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है:

  • विविधता की जीत: मुंबई, ठाणे और पुणे जैसे महानगरों में गैर-मराठी भाषी आबादी का एक बड़ा हिस्सा रहता है। 80 गैर-मराठी पार्षदों की जीत यह दर्शाती है कि भाजपा और अन्य दलों ने इन समुदायों का विश्वास जीतने में सफलता हासिल की है।
  • मराठी वोट बैंक में सेंध: जानकारों का मानना है कि केवल मराठी अस्मिता के भरोसे चुनाव जीतना अब कठिन हो गया है, क्योंकि खुद मराठी मतदाताओं ने भी इस बार राष्ट्रीय मुद्दों और स्थानीय विकास को प्राथमिकता दी है।
  • उत्तर भारतीय फैक्टर: जीते हुए 80 पार्षदों में से एक बड़ा हिस्सा उत्तर भारतीय उम्मीदवारों का है, जिन्होंने भाजपा और गठबंधन के टिकट पर चुनावी मैदान में अपनी धाक जमाई है।

ठाकरे और राज ठाकरे की रणनीति क्यों हुई फेल?

राजनीतिक विशेषज्ञों ने इस हार के पीछे कई प्रमुख कारण बताए हैं:

  1. समावेशी राजनीति का अभाव: उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का पूरा ध्यान केवल मराठी मतदाताओं पर केंद्रित रहा, जबकि विपक्षी दलों ने ‘सबका साथ-साथ सबका विकास’ के नारे के साथ सभी भाषाई समुदायों को प्रतिनिधित्व दिया।
  2. वोटों का ध्रुवीकरण: मराठी वोटों के विभाजन का फायदा अन्य समुदायों के संगठित वोट बैंक को मिला।
  3. विकास बनाम अस्मिता: युवाओं और मध्यम वर्ग के मतदाताओं ने पहचान की राजनीति के बजाय रोजगार, इंफ्रास्ट्रक्चर और नागरिक सुविधाओं के मुद्दे पर भरोसा जताया।

राष्ट्रीय दलों को मिला फायदा

निकाय चुनावों में मिली इस सफलता से भाजपा और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों के हौसले बुलंद हैं:

  • बीजेपी की मजबूती: गैर-मराठी पार्षदों की जीत में सबसे बड़ा योगदान भाजपा का माना जा रहा है, जिसने सोची-समझी रणनीति के तहत अलग-अलग भाषाई क्षेत्रों में उन्हीं समुदायों के नेताओं को चुनावी मैदान में उतारा।
  • गठबंधन की ताकत: सत्ताधारी गठबंधन ने ‘मराठी वर्सेस गैर-मराठी’ की बहस के बजाय ‘विकास के विजन’ को आगे रखा, जिसने मतदाताओं को प्रभावित किया।

 

80 गैर-मराठी पार्षदों का चुना जाना महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। यह नतीजे बताते हैं कि अब राज्य के निकाय चुनावों में केवल भाषाई पहचान के आधार पर जीत सुनिश्चित नहीं की जा सकती। उद्धव और राज ठाकरे के लिए यह आत्ममंथन का समय है कि वे अपनी राजनीति को केवल ‘मराठी मानुस’ तक सीमित रखते हैं या बदलते परिवेश में अपनी विचारधारा को और अधिक समावेशी बनाते हैं।

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