मणिपुर में जारी जातीय तनाव और हिंसा से विस्थापित हुए लोगों का धैर्य अब जवाब देता दिखाई दे रहा है। सोमवार को बड़ी संख्या में प्रभावित परिवारों ने राजधानी इम्फाल स्थित राजभवन के पास विरोध-प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों का मुख्य मांगपत्र था कि सरकार उन्हें उनके मूल घरों में सुरक्षित रूप से वापस लौटने की व्यवस्था करे। कई महीनों से राहत शिविरों में रह रहे लोगों ने कहा कि हालात सामान्य होने के दावों के बावजूद वे अब भी अपने गांवों और घरों में लौटने से वंचित हैं।
प्रदर्शन में शामिल महिलाओं, बुजुर्गों और युवाओं ने कहा कि जातीय हिंसा ने उन्हें न केवल आशियाने से बेघर किया, बल्कि उनकी आजीविका और सामाजिक जीवन को भी गंभीर रूप से प्रभावित किया है। कई लोगों ने बताया कि वे महीनों से अस्थायी शिविरों में कठिन परिस्थितियों में रह रहे हैं, जहां पानी, बिजली और चिकित्सा सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि शासन और प्रशासन द्वारा राहत शिविरों में लगातार रह रहे परिवारों की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए जा रहे।
प्रदर्शनकारियों ने राजभवन की ओर रैली निकालते हुए “हमें घर लौटने दो”, “हम सुरक्षित वापसी चाहते हैं” और “सरकार हमारी सुनवाई करे” जैसे नारे लगाए। उन्होंने कहा कि सरकार बार-बार सुरक्षा के दावे करती है, लेकिन जमीन पर हालात इसके विपरीत हैं, जिसके कारण वे अब भी अपने गांव वापस जाने से डरते हैं। कई लोगों ने भावुक होकर कहा कि उनके घर नष्ट हो गए, खेत-खलिहान बर्बाद हो गए और बच्चों की पढ़ाई भी बाधित हो गई है।
विरोध-प्रदर्शन की सूचना मिलते ही पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों को शांत कराने की कोशिश की और आश्वासन दिया कि उनकी चिंताओं और मांगों को उच्च स्तर तक पहुंचाया जाएगा। प्रशासन ने कहा कि सुरक्षा एजेंसियां लगातार हालात की समीक्षा कर रही हैं और जहां भी संभव हो रहा है, वहां पुनर्वास प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाया जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मणिपुर की स्थिति अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं है और जातीय विश्वास बहाली में समय लग सकता है। प्रभावित परिवारों की मांग है कि सरकार पहले उन्हें सुरक्षा का स्पष्ट भरोसा दे और गांवों में पुनर्वास के लिए पुख्ता व्यवस्था करे, तभी वे अपने घरों को लौटने पर विचार करेंगे।
प्रदर्शन के बाद भी विस्थापित लोगों में आक्रोश और चिंता बनी हुई है। उनका कहना है कि जब तक उन्हें सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से वापस नहीं भेजा जाता, वे आंदोलन जारी रखेंगे।





