नागपुर/नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्र की अखंडता और सामाजिक समरसता पर बड़ा बयान दिया है। भागवत ने दृढ़ता के साथ कहा कि भारत अब भविष्य में कभी विभाजित नहीं होगा और 1947 के बंटवारे जैसी त्रासदी को फिर से कभी दोहराने नहीं दिया जाएगा। अपने संबोधन के दौरान उन्होंने देश के ज्वलंत मुद्दों, जैसे जनसंख्या नीति और समान नागरिक संहिता (UCC) पर भी संघ का दृष्टिकोण स्पष्ट किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत का उत्थान अब एक निरंतर प्रक्रिया है जिसे कोई रोक नहीं सकता।
अखंड भारत और एकता का संदेश
डॉ. भागवत ने भारत की ऐतिहासिक भूलों से सीख लेने की बात करते हुए अखंडता पर बल दिया:
- विभाजन पर प्रहार: उन्होंने कहा कि भारत का विभाजन एक ऐसी वेदना थी जिसे भुलाया नहीं जा सकता, लेकिन अब भारत इतना सामर्थ्यवान है कि वह अपनी सीमाओं और एकता की रक्षा करना जानता है।
- भविष्य का संकल्प: सरसंघचालक ने स्पष्ट किया कि समाज के सभी वर्गों को साथ मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि देश के भीतर अलगाववाद की कोई जगह न बचे।
जनसंख्या नीति: “संतुलन जरूरी, बोझ नहीं”
जनसंख्या के मुद्दे पर डॉ. भागवत ने एक समग्र और निष्पक्ष नीति की वकालत की:
- साधनों का प्रबंधन: उन्होंने कहा कि बढ़ती जनसंख्या केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि संसाधनों पर पड़ने वाला दबाव भी है। हमें ऐसी नीति की आवश्यकता है जो सभी पर समान रूप से लागू हो।
- जनसांख्यिकीय संतुलन: भागवत ने आगाह किया कि जनसंख्या असंतुलन अक्सर भौगोलिक सीमाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौतियां पैदा करता है, इसलिए इसे केवल धार्मिक चश्मे से नहीं बल्कि राष्ट्रहित में देखा जाना चाहिए।
समान नागरिक संहिता (UCC) पर विचार
UCC के समर्थन में अपनी बात रखते हुए उन्होंने इसे न्याय और समानता का आधार बताया:
- संवैधानिक मर्यादा: भागवत ने कहा कि संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में भी समान नागरिक संहिता का उल्लेख है। यह किसी विशेष धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि सभी नागरिकों को समान अधिकार देने की पहल है।
- सामाजिक समरसता: उन्होंने तर्क दिया कि जब कानून सबके लिए एक होंगे, तो समाज में भेदभाव कम होगा और एकता की भावना मजबूत होगी।
“विश्व गुरु” बनने की ओर अग्रसर भारत
सरसंघचालक ने वैश्विक परिदृश्य में भारत की भूमिका पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि दुनिया आज भारत की ओर शांति और समाधान के लिए देख रही है। “स्व” (आत्मबोध) के आधार पर ही भारत दुनिया का नेतृत्व कर सकता है। उन्होंने स्वयंसेवकों और समाज से आह्वान किया कि वे अपनी कमियों को दूर कर एक शक्तिशाली और स्वावलंबी राष्ट्र के निर्माण में जुटें।





