देहरादून: राजधानी के एक प्रतिष्ठित बोर्डिंग स्कूल में नाबालिग छात्र के साथ कुकर्म करने वाले आरोपी कर्मचारी को माननीय अदालत ने दोषी करार देते हुए सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो) की अदालत ने इस मामले में सुनवाई पूरी करते हुए न केवल जेल की सजा दी, बल्कि दोषी पर आर्थिक दंड भी लगाया है। अदालत ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि शिक्षण संस्थानों में बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि है और ऐसे घृणित कृत्यों से समाज का विश्वास डगमगाता है, इसलिए अपराधी के प्रति किसी भी प्रकार की नरमी नहीं बरती जा सकती।
क्या था पूरा मामला? (वारदात का विवरण)
यह घटना करीब दो साल पहले की है, जब देहरादून के एक जाने-माने बोर्डिंग स्कूल में कार्यरत एक कर्मचारी ने मर्यादाओं की सारी सीमाएं लांघ दी थीं:
- भरोसे का कत्ल: आरोपी स्कूल के छात्रावास (Hostel) में सहायक के रूप में कार्यरत था। उसने एक नाबालिग छात्र को अकेले पाकर उसके साथ कुकर्म (अप्राकृतिक यौन संबंध) की वारदात को अंजाम दिया।
- धमकी और डर: आरोपी ने छात्र को डराया-धमकाया था कि यदि उसने किसी को इस बारे में बताया तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे, जिसके कारण पीड़ित सहमा हुआ था।
- मामले का खुलासा: छात्र के व्यवहार में आए बदलाव और शारीरिक परेशानी को देखते हुए जब परिजनों ने उससे विश्वास में लेकर पूछताछ की, तब इस पूरी घटना का खुलासा हुआ।
न्यायिक प्रक्रिया और साक्ष्य
पुलिस ने परिजनों की तहरीर पर तत्काल मुकदमा दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया था, जिसके बाद मामला अदालत में चला:
- पॉक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई: चूंकि पीड़ित नाबालिग था, इसलिए पुलिस ने आईपीसी की धाराओं के साथ-साथ पॉक्सो अधिनियम (Protection of Children from Sexual Offences Act) के तहत आरोप पत्र दाखिल किया।
- चिकित्सीय रिपोर्ट: अदालत में पेश की गई मेडिकल रिपोर्ट और फॉरेंसिक साक्ष्यों ने अभियोजन पक्ष के दावों की पुष्टि की।
- पीड़ित का बयान: अदालत ने पीड़ित छात्र के बयानों को बेहद महत्वपूर्ण माना, जिसने बिना डरे पूरी घटना का सिलसिलेवार विवरण पेश किया।
अदालत का फैसला और संदेश
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुनाया:
- सजा का निर्धारण: दोषी को सात वर्ष की जेल और जुर्माने की सजा सुनाई गई। जुर्माना अदा न करने की स्थिति में जेल की अवधि और बढ़ाई जा सकती है।
- संस्थानों के लिए चेतावनी: अदालत ने स्कूल प्रबंधन की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठाए और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सख्त सुरक्षा प्रोटोकॉल और कर्मचारियों के चरित्र सत्यापन (Police Verification) को अनिवार्य बताया।
इस फैसले का सामाजिक कार्यकर्ताओं और अभिभावकों ने स्वागत किया है। उनका मानना है कि ऐसे फैसलों से बच्चों के खिलाफ अपराध करने वाले तत्वों में भय पैदा होगा। देहरादून पुलिस ने भी इस मामले में त्वरित जांच और प्रभावी पैरवी की, जिसके परिणामस्वरूप आरोपी को सलाखों के पीछे भेजा जा सका।





