Thursday, February 19, 2026

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बॉम्बे हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: ‘मां द्वारा अकेले पाले गए बच्चे के लिए पिता का सरनेम अनिवार्य नहीं’; मातृत्व के अधिकारों को दी बड़ी मान्यता

मुंबई: बॉम्बे हाई कोर्ट ने माता-पिता और बच्चों के अधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी बच्चे का पालन-पोषण उसकी मां ने अकेले (Single Mother) किया है, तो उस बच्चे के नाम के साथ पिता का उपनाम (Surname) जोड़ना अनिवार्य नहीं है। जस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस श्याम चांडक की खंडपीठ ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि एक मां को यह पूरा अधिकार है कि वह अपने बच्चे को अपनी पहचान और अपना सरनेम दे सके, खासकर तब जब पिता का बच्चे के जीवन में कोई योगदान न रहा हो।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला एक महिला द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था, जिसमें उसने अपने बच्चे के पासपोर्ट और स्कूल दस्तावेजों में बदलाव की मांग की थी:

  • तलाक और अकेले पालन-पोषण: याचिकाकर्ता महिला का अपने पति से वर्षों पहले तलाक हो गया था। तब से वह अपने बच्चे को अकेले पाल रही थी।
  • अधिकारियों का इनकार: महिला चाहती थी कि बच्चे के दस्तावेजों से पिता का नाम और सरनेम हटाकर उसकी अपनी पहचान जोड़ी जाए, लेकिन संबंधित अधिकारियों ने कानूनी अड़चनों का हवाला देते हुए ऐसा करने से मना कर दिया था।
  • अदालत की शरण: महिला ने बॉम्बे हाई कोर्ट में गुहार लगाई कि जब बच्चे के जीवन में पिता का कोई अस्तित्व ही नहीं है, तो सरनेम का बोझ क्यों ढोया जाए।

हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: ‘मां की मेहनत का सम्मान जरूरी’

सुनवाई के दौरान अदालत ने समाज और कानूनी व्यवस्था को आइना दिखाते हुए कई महत्वपूर्ण बातें कहीं:

  1. मां की पहचान ही पर्याप्त: अदालत ने कहा कि कानून किसी बच्चे को उसकी मां का सरनेम इस्तेमाल करने से नहीं रोकता। यदि एक मां ने बच्चे को जन्म दिया है और उसका पालन-पोषण किया है, तो उसे बच्चे की पहचान तय करने का नैसर्गिक अधिकार है।
  2. बच्चे के हित सर्वोपरि: हाई कोर्ट ने जोर दिया कि दस्तावेजों में पिता का नाम अनिवार्य करने से कई बार सिंगल मदर्स और उनके बच्चों को मानसिक प्रताड़ना और सामाजिक शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है, जो उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
  3. पितृसत्तात्मक सोच पर चोट: विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला सदियों से चली आ रही उस पितृसत्तात्मक धारणा को चुनौती देता है जिसमें बच्चे की पहचान केवल पिता के नाम से ही तय की जाती थी।

प्रशासन को निर्देश: दस्तावेजों में करें तुरंत बदलाव

अदालत ने केवल टिप्पणी ही नहीं की, बल्कि संबंधित विभागों को कड़े निर्देश भी जारी किए:

  • पासपोर्ट और प्रमाण पत्र: हाई कोर्ट ने पासपोर्ट कार्यालय और नगर निगम को निर्देश दिया कि वे महिला की मांग के अनुसार बच्चे के दस्तावेजों में संशोधन करें और पिता के सरनेम की अनिवार्यता को खत्म करें।

नियमों में ढील: अदालत ने कहा कि सरकारी विभागों को ऐसे संवेदनशील मामलों में तकनीकी खामियां निकालने के बजाय मानवीय और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

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