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बिहार SIR पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: मतदाता सूची पुनरीक्षण में खामियों पर जताई चिंता, BSLSA को मतदाताओं की मदद का निर्देश

नई दिल्ली।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर शुरू हुई कानूनी जंग अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुकी है। बुधवार को इस मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (BSLSA) को विशेष निर्देश जारी किए और कहा कि मतदाताओं की हरसंभव मदद सुनिश्चित की जाए।

मतदाता सूची से नाम कटने पर कोर्ट की चिंता
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन मतदाताओं के नाम चुनाव आयोग की पुनरीक्षित सूची से हटाए गए हैं, उनकी अपीलों पर निर्धारित समय सीमा के भीतर निर्णय होना आवश्यक है।
अदालत ने इस मुद्दे पर अगली सुनवाई की तारीख पर विचार करने का निर्णय लिया।
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि SIR प्रक्रिया में भारी अनियमितताएं हुई हैं, जिसके चलते हजारों वास्तविक मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए। उन्होंने मांग की कि ऐसी अपीलों पर तय समय में सुनवाई कर न्याय सुनिश्चित किया जाए।

चुनाव आयोग का दावा: NGO ने दिया गलत विवरण
दूसरी ओर, चुनाव आयोग (ECI) ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कहा कि याचिकाकर्ता NGO ने गलत और भ्रामक जानकारी प्रस्तुत की है।
आयोग के अनुसार, जिस व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का दावा किया गया, वह व्यक्ति वास्तव में मौजूद ही नहीं है।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा,
“हमें आश्चर्य है कि ऐसा व्यक्ति अस्तित्व में भी नहीं है, जिसके नाम पर फर्जी दावा दायर किया गया।”

प्रशांत भूषण ने दी सफाई
एनजीओ की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत से कहा कि
“नाम हटाए जाने से जुड़ी जानकारी की पुष्टि BSLSA की मदद से की जा सकती है। हमारा उद्देश्य केवल पारदर्शिता सुनिश्चित करना है, न कि विवाद खड़ा करना।”

कांग्रेस ने भी उठाए सवाल
इससे पहले, कांग्रेस पार्टी ने भी बिहार में हुई SIR प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठाए थे।
पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने आरोप लगाया कि
“मतदाता सूची में अब भी लाखों की संख्या में डुप्लीकेट एंट्री मौजूद हैं। अगर विशेष पुनरीक्षण के बाद भी पारदर्शिता नहीं आई, तो यह लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न है।”
उन्होंने चुनाव आयोग से मतदाता सूची को सार्वजनिक रूप से सत्यापित करने और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग की।

आयोग ने बताया SIR सफल
वहीं, मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार ने SIR प्रक्रिया को सफल करार दिया है।
6 अक्तूबर को प्रेस वार्ता में उन्होंने बताया कि
“बिहार की 243 विधानसभा सीटों पर दो चरणों में मतदान होगा — पहले चरण में 6 नवंबर और दूसरे चरण में 11 नवंबर, जबकि नतीजे 14 नवंबर को घोषित किए जाएंगे।”
आयोग ने दावा किया कि पुनरीक्षण प्रक्रिया के बाद 7.23 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची में जोड़े गए हैं।

विवाद के केंद्र में आंकड़े
चुनाव आयोग के दावों के बावजूद, सिविल सोसाइटी और कुछ राजनीतिक संगठनों का कहना है कि मतदाता सूची के आंकड़े बिहार की जनसंख्या और वयस्क आबादी के अनुपात से मेल नहीं खाते।
याचिकाकर्ता योगेंद्र यादव ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि
“SIR पूरी होने के बावजूद मतदाता सूची में कई डुप्लीकेट नाम अब भी मौजूद हैं, जबकि बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम गायब हैं।”
कुछ संगठनों ने ‘घुसपैठियों के नाम सूची में शामिल होने’ के आरोप भी लगाए हैं, जिससे मामला और जटिल हो गया है।

अगली सुनवाई में तय होगी दिशा
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई में नाम कटने के मामलों की अपीलों पर निर्णय की समय सीमा तय करने पर विचार किया जाएगा।
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि आवश्यक हुआ तो BSLSA को सीधे तौर पर निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है।

बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मतदाता सूची को लेकर उठा यह विवाद अब चुनावी पारदर्शिता और मतदाता अधिकारों का अहम मुद्दा बन चुका है।
सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में यह मामला आगे बढ़ रहा है, और अगली सुनवाई यह तय करेगी कि क्या बिहार के मतदाता निडर होकर और निष्पक्ष तरीके से मतदान कर पाएंगे या नहीं।

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