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बिंदुखत्ता को राजस्व गांव बनाने की राह में कानूनी अड़चन: हाई कोर्ट ने निस्तारित की जनहित याचिका; एक लाख की आबादी को लगा बड़ा झटका

नैनीताल (20 मार्च, 2026): नैनीताल जिले के बिंदुखत्ता क्षेत्र को राजस्व गांव का दर्जा दिलाने की उम्मीदों को उत्तराखंड हाई कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने बिंदुखत्ता की लगभग एक लाख की आबादी को राजस्व गांव बनाने की मांग को लेकर दायर जनहित याचिका को निस्तारित (Dispose) कर दिया है। इस फैसले के बाद क्षेत्र के निवासियों में मायूसी छा गई है, क्योंकि वे दशकों से मालिकाना हक और बुनियादी सुविधाओं के लिए राजस्व गांव के दर्जे की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

याचिकाकर्ता का तर्क: दो मुख्यमंत्रियों की घोषणा के बाद भी वादाखिलाफी

चोरगलिया निवासी सामाजिक कार्यकर्ता भुवन पोखरिया ने जनहित याचिका के माध्यम से बिंदुखत्ता की दुर्दशा का मुद्दा उठाया था:

  • मुख्यमंत्री की घोषणा पर सवाल: याचिका में कहा गया कि प्रदेश के दो-दो मुख्यमंत्रियों ने बिंदुखत्ता को राजस्व गांव बनाने की सार्वजनिक घोषणा की थी। इसके बावजूद, 2 दिसंबर, 2025 को सरकार ने मुख्यमंत्री की पूर्व घोषणा को अचानक ‘विलोपित’ (Cancel) कर दिया, जो क्षेत्र की जनता के साथ विश्वासघात है।
  • विशाल आबादी की अनदेखी: बिंदुखत्ता में करीब एक लाख लोग निवास करते हैं, जो मूलभूत सरकारी सुविधाओं और भूमि के मालिकाना हक से वंचित हैं।

समानता का अधिकार: सुंदरखाल और दमुवाढूंगा का दिया हवाला

याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि जब अन्य क्षेत्रों को अधिकार मिल सकते हैं, तो बिंदुखत्ता को क्यों नहीं:

  1. सफल उदाहरण: हरिद्वार जिले के चार गांवों और रामनगर के सुंदरखाल को राजस्व गांव का दर्जा दिया जा चुका है।
  2. मांग: याचिका में अनुरोध किया गया कि वनाधिकार कानून 2006 के तहत बिंदुखत्ता को भी हल्द्वानी के दमुवाढूंगा की तर्ज पर राजस्व गांव घोषित किया जाना चाहिए। उत्तराखंड में लगभग पांच लाख लोग वनों और खत्तों में रहते हैं, जिनके भविष्य पर इस फैसले का सीधा असर पड़ेगा।

सरकार का रुख और कोर्ट का फैसला

मामले की सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से पेश किए गए तकनीकी और कानूनी पहलुओं को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने याचिका को निस्तारित कर दिया।

  • अदालती रुख: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राजस्व गांव का दर्जा देना एक प्रशासनिक और नीतिगत प्रक्रिया है, जिसमें वनाधिकार और पर्यावरणीय नियमों का पालन अनिवार्य है। याचिका निस्तारित होने का अर्थ है कि अब गेंद पूरी तरह से राज्य सरकार और केंद्र के पाले में है।

बिंदुखत्ता में उबाल: आंदोलन की चेतावनी

हाई कोर्ट के इस निर्णय के बाद बिंदुखत्ता क्षेत्र में राजनीतिक और सामाजिक सरगर्मी बढ़ गई है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और वनाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि वे चुप नहीं बैठेंगे।

  • रणनीति: क्षेत्र के लोग अब इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाने या सरकार पर दबाव बनाने के लिए बड़ा जन-आंदोलन शुरू करने की योजना बना रहे हैं।

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