वाशिंगटन/कोपेनहेगन: अमेरिका के राष्ट्रपति और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में सक्रिय डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपने पुराने और विवादित ‘ग्रीनलैंड खरीद’ प्रस्ताव को हवा देकर वैश्विक राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप ने डेनमार्क के अधिकार क्षेत्र वाले द्वीप ‘ग्रीनलैंड’ को खरीदने के लिए एक ऐसा प्रस्ताव पेश किया है जिसे ‘रियल एस्टेट डील ऑफ द सेंचुरी’ कहा जा रहा है। इस प्रस्ताव के तहत डेनमार्क के हर नागरिक को बड़ी धनराशि देने का दावा किया जा रहा है।
क्या है ट्रंप का 90 लाख रुपये वाला ‘ऑफर’?
सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय गलियारों में चल रही खबरों के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन की ओर से संकेत दिए गए हैं कि यदि डेनमार्क ग्रीनलैंड का नियंत्रण अमेरिका को सौंप देता है, तो इसके बदले में वहां के प्रत्येक नागरिक को लगभग 1 मिलियन क्रोनर (करीब 90 लाख भारतीय रुपये) का मुआवजा या आर्थिक पैकेज दिया जा सकता है। ट्रंप का तर्क है कि ग्रीनलैंड का रखरखाव डेनमार्क की अर्थव्यवस्था पर बोझ है, जबकि अमेरिका इसे एक रणनीतिक संपत्ति के रूप में विकसित कर सकता है।
ग्रीनलैंड में ट्रंप की दिलचस्पी के पीछे का कारण
दुनिया के सबसे बड़े द्वीप ग्रीनलैंड में अमेरिका की दिलचस्पी कोई नई नहीं है, लेकिन ट्रंप ने इसे एक कारोबारी सौदे की तरह पेश किया है। इसके पीछे मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
- प्राकृतिक संसाधन: ग्रीनलैंड के बर्फ के नीचे कोयला, लोहा, जस्ता और दुर्लभ खनिज (Rare Earth Minerals) का विशाल भंडार होने का अनुमान है।
- रणनीतिक स्थान: आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए एक आदर्श सैन्य अड्डा साबित हो सकता है।
- शिपिंग मार्ग: ग्लोबल वार्मिंग के कारण बर्फ पिघलने से नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं, जो व्यापार के नजरिए से बेहद महत्वपूर्ण हैं।
डेनमार्क की तीखी प्रतिक्रिया: “हम बिकाऊ नहीं हैं”
ट्रंप के इस ‘ऑफर’ पर डेनमार्क की सरकार और वहां की जनता ने सख्त नाराजगी जाहिर की है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने इस विचार को ‘बेतुका’ (Absurd) करार देते हुए स्पष्ट किया है कि ग्रीनलैंड कोई संपत्ति नहीं बल्कि एक स्वायत्त क्षेत्र है। उन्होंने दो टूक कहा, “ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है। यह कोई अचल संपत्ति नहीं है जिसे एक देश से दूसरे देश को हस्तांतरित किया जा सके। लोग वस्तु नहीं हैं।”
विवाद और कूटनीतिक तनाव
विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप का यह तरीका ‘पैसा लो अपना देश दो’ वाली नीति जैसा है, जो अंतरराष्ट्रीय संप्रभुता के सिद्धांतों के खिलाफ है। आलोचकों का मानना है कि इस तरह के बयानों से अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के बीच कूटनीतिक संबंध खराब हो सकते हैं। हालांकि, ट्रंप के समर्थक इसे एक ‘साहसिक आर्थिक कदम’ के रूप में देख रहे हैं जो भविष्य में अमेरिका को सुपरपावर बनाए रखने में मदद करेगा।





