इस्लामाबाद/नई दिल्ली: पाकिस्तान के लिए साल 2025 किसी बुरे सपने से कम नहीं रहा है। एक तरफ जहां देश का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खाली होने की कगार पर पहुँच गया है, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक अस्थिरता ने अर्थव्यवस्था को गर्त में धकेल दिया है। पाकिस्तान के भीतर से ही अब यह आवाजें उठने लगी हैं कि देश अपने इतिहास के सबसे खतरनाक दौर से गुजर रहा है और यदि जल्द ही बड़े सुधार नहीं हुए, तो इसका पतन निश्चित है।
कर्ज के बोझ तले दबा भविष्य साल 2025 में पाकिस्तान की स्थिति इतनी नाजुक हो गई कि उसे अपने पुराने कर्जों की किस्त चुकाने के लिए भी नए कर्ज लेने पड़े। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की सख्त शर्तों और वैश्विक दाताओं की बेरुखी ने देश में बिजली, गैस और ईंधन की कीमतों को आम आदमी की पहुँच से बाहर कर दिया है। पाकिस्तान के कई प्रमुख शहरों में बुनियादी सुविधाओं की भारी किल्लत देखी गई, जिससे उद्योग-धंधे ठप हो गए और बेरोजगारी चरम पर पहुँच गई।
‘अपने ही दे रहे हैं चेतावनी’ हैरानी की बात यह है कि इस बार चेतावनी बाहरी दुनिया से नहीं, बल्कि पाकिस्तान के अपने विशेषज्ञों और पूर्व अधिकारियों की तरफ से आई है। पाकिस्तान के वरिष्ठ अर्थशास्त्रियों और बुद्धिजीवियों का मानना है कि देश अब ‘पतन के करीब’ है। उनका तर्क है कि नीतियों में निरंतरता की कमी और भ्रष्टाचार ने देश के संस्थानों को खोखला कर दिया है। पाकिस्तानी मीडिया में प्रकाशित लेखों में इस साल को ‘राष्ट्रीय शर्म और तबाही’ का साल करार दिया जा रहा है।
सुरक्षा और राजनीति की दोहरी मार आर्थिक तबाही के साथ-साथ, साल 2025 में पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में आतंकी गतिविधियों में भी भारी इजाफा हुआ। सुरक्षा पर होने वाले भारी खर्च ने खजाने पर और बोझ डाला। वहीं, सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच चल रही खींचतान ने विदेशी निवेशकों का भरोसा पूरी तरह तोड़ दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान केवल आर्थिक रूप से ही नहीं, बल्कि एक राज्य (State) के रूप में भी विफल होने की दिशा में बढ़ रहा है।





