देहरादून। पंचायत चुनाव में जीत हासिल करने के बाद भी प्रदेश के अधिकांश ग्राम प्रधान आज भी जिम्मेदारियों से वंचित हैं। आंकड़ों के मुताबिक, करीब 63 प्रतिशत प्रधानों को अभी तक कार्यभार नहीं सौंपा गया है। नतीजा यह है कि वे बिना बस्ते के खाली बैठे हैं और गांवों के विकास कार्य ठप पड़े हुए हैं। इससे ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, पंचायत चुनाव में निर्वाचित प्रधानों को अधिकार और जिम्मेदारियां सौंपने में देरी हो रही है। कई जगह प्रशासनिक स्तर पर फाइलें अटकी पड़ी हैं तो कहीं कानूनी पेचिदगियां आड़े आ रही हैं। इस वजह से गांवों में योजनाओं का क्रियान्वयन अधर में लटका हुआ है।
ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधियों का कहना है कि अगर जल्द ही समस्या का समाधान नहीं हुआ तो उन्हें मजबूरन आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ेगा। कई सामाजिक संगठनों और ग्रामीणों ने तो अब उपचुनाव कराने की मांग भी उठानी शुरू कर दी है। उनका कहना है कि जब चुने हुए प्रधानों को जिम्मेदारी ही नहीं दी जा रही तो नए चुनाव कराकर सक्षम प्रतिनिधियों को मौका दिया जाना चाहिए।
राज्यभर में यह मुद्दा धीरे-धीरे सियासी रंग भी लेने लगा है। विपक्षी दलों ने सरकार पर ग्राम पंचायत व्यवस्था की अनदेखी करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि पंचायतें ही लोकतंत्र की बुनियाद हैं और यदि प्रधानों को ही निष्क्रिय कर दिया जाएगा तो गांवों का विकास रुक जाएगा।
उधर, प्रशासन का कहना है कि तकनीकी खामियों और कुछ कानूनी अड़चनों को दूर करने के प्रयास जारी हैं। अधिकारियों ने आश्वासन दिया है कि जल्द ही सभी प्रधानों को कार्यभार सौंपा जाएगा, ताकि विकास योजनाएं पटरी पर लौट सकें।





