ओस्लो/वाशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों द्वारा उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार दिए जाने की लगातार उठ रही मांगों के बीच नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोर ने एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। प्रधानमंत्री स्टोर ने स्पष्ट किया है कि नोबेल शांति पुरस्कार देने या न देने के फैसले में नॉर्वे की सरकार की कोई भूमिका नहीं होती है। उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह से एक स्वतंत्र ‘नोबेल समिति’ का विशेषाधिकार है। ट्रंप को पुरस्कार न मिलने पर हो रही आलोचनाओं का जवाब देते हुए पीएम स्टोर ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया से बातचीत में कहा कि “नोबेल समिति राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर कार्य करती है और सरकार उसके निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं करती।” उनके इस बयान को ट्रंप के उन दावों और समर्थकों की नाराजगी के जवाब के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें बार-बार ट्रंप को दुनिया में शांति स्थापित करने (विशेषकर अब्राहम एकॉर्ड) के लिए इस सम्मान का हकदार बताया जाता रहा है।
क्यों उठा है यह विवाद?
डोनाल्ड ट्रंप और नोबेल शांति पुरस्कार का रिश्ता लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है:
- ट्रंप के समर्थकों का तर्क: ट्रंप के समर्थकों का मानना है कि उन्होंने अपने पिछले कार्यकाल में मध्य पूर्व में शांति के लिए ‘अब्राहम एकॉर्ड’ (इजरायल और अरब देशों के बीच समझौता) कराया और उत्तर कोरिया के साथ बातचीत शुरू की, जिसके लिए उन्हें नोबेल मिलना चाहिए था।
- ट्रंप के स्वयं के दावे: डोनाल्ड ट्रंप ने कई रैलियों में यह कहा है कि उन्हें नोबेल मिलना चाहिए था, लेकिन उन्हें “पक्षपात” के कारण इससे वंचित रखा गया।
- नॉर्वेजियन सांसद का नामांकन: हाल ही में नॉर्वे के ही एक दक्षिणपंथी सांसद ने ट्रंप का नाम फिर से नामांकन के लिए भेजा था, जिसके बाद यह बहस दोबारा छिड़ गई।
नोबेल चयन की प्रक्रिया: प्रधानमंत्री ने क्या समझाया?
प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोर ने इस प्रक्रिया की पारदर्शिता और स्वायत्तता पर प्रकाश डाला:
- स्वतंत्र समिति: उन्होंने बताया कि नोबेल शांति पुरस्कार के लिए समिति का चयन नॉर्वेजियन संसद द्वारा किया जाता है, लेकिन चयन होने के बाद यह समिति किसी भी सरकारी या विधायी नियंत्रण से बाहर होती है।
- सरकार का हस्तक्षेप शून्य: पीएम ने जोर देकर कहा कि “दुनिया को यह समझना चाहिए कि नॉर्वे की सरकार न तो किसी का नाम प्रस्तावित करती है और न ही किसी के नाम पर वीटो (Veto) लगाती है।”
- गोपनीयता के नियम: नोबेल समिति के नियम इतने सख्त हैं कि नामांकन और चर्चाओं के विवरण को 50 वर्षों तक सार्वजनिक नहीं किया जाता है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और वैश्विक प्रभाव
इस बयान के बाद वैश्विक कूटनीति में भी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं:
- यूरोपीय देशों का समर्थन: कई यूरोपीय नेताओं ने नॉर्वे के प्रधानमंत्री के बयान का समर्थन करते हुए कहा है कि संस्थानों की स्वतंत्रता बनाए रखना लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है।
- ट्रंप खेमे की नाराजगी: ट्रंप के करीबी सहयोगियों का मानना है कि ओबामा जैसे नेताओं को कार्यकाल की शुरुआत में ही नोबेल दे दिया गया, जबकि ट्रंप की उपलब्धियों को नजरअंदाज किया जा रहा है, जो ‘संस्थागत पूर्वाग्रह’ को दर्शाता है।
निष्कर्ष: सम्मान की गरिमा और राजनीति की खींचतान
नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर हो रही यह खींचतान दर्शाती है कि यह सम्मान केवल एक मेडल नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली राजनीतिक प्रतीक बन चुका है। नॉर्वे के प्रधानमंत्री के स्पष्टीकरण ने यह साफ कर दिया है कि ओस्लो (Oslo) इस विवाद से खुद को दूर रखना चाहता है। अब गेंद पूरी तरह से नोबेल समिति के पाले में है कि वह आने वाले वर्षों में वैश्विक शांति के लिए किसके योगदान को सर्वोच्च मानती है।





