काठमांडू: पड़ोसी देश नेपाल में एक बार फिर राजशाही की वापसी को लेकर सुगबुगाहट तेज हो गई है। राजधानी काठमांडू सहित देश के विभिन्न हिस्सों में पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र शाह के समर्थकों ने विशाल शक्ति प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने ‘राजा आओ, देश बचाओ’ और ‘हिंदू राष्ट्र कायम करो’ जैसे नारों के साथ मौजूदा संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य व्यवस्था के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि 2008 में राजशाही खत्म होने के बाद से देश में राजनीतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार और विदेशी हस्तक्षेप बढ़ा है, जिसका एकमात्र समाधान राजशाही की बहाली है।
सड़कों पर प्रदर्शन: राजभक्तों का शक्ति प्रदर्शन
काठमांडू के हृदय स्थल ‘दरबार मार्ग’ और ‘रत्न पार्क’ इलाके में हजारों की संख्या में लोग जुटे, जिससे यातायात पूरी तरह ठप हो गया:
- पूर्व नरेश के प्रति समर्थन: प्रदर्शनकारी हाथों में नेपाल का राष्ट्रीय ध्वज और पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह की तस्वीरें लेकर चल रहे थे।
- नारेबाजी: भीड़ ने मौजूदा सरकार और राजनीतिक दलों के खिलाफ आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान व्यवस्था नेपाल की पहचान और संप्रभुता की रक्षा करने में विफल रही है।
- हिंदू राष्ट्र की मांग: नेपाल को फिर से ‘संवैधानिक हिंदू राष्ट्र’ घोषित करने की मांग भी इस आंदोलन का एक प्रमुख हिस्सा रही।
क्यों उठ रही है राजशाही बहाली की मांग?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, नेपाल में जनता के एक वर्ग के बीच राजशाही के प्रति बढ़ते झुकाव के कई मुख्य कारण हैं:
- राजनीतिक अस्थिरता: राजशाही के अंत के बाद से नेपाल ने कई सरकारें बदलते देखी हैं। गठबंधन सरकारों की आपसी खींचतान से जनता में निराशा बढ़ी है।
- आर्थिक संकट: देश में बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और धीमी विकास दर ने आम नागरिकों को पुरानी व्यवस्था की याद दिला दी है।
- राष्ट्रीय एकता का प्रतीक: समर्थकों का तर्क है कि राजा देश की विविधता के बीच एकता का सूत्रधार होता है, जबकि राजनीतिक दल केवल अपने वोट बैंक की चिंता करते हैं।
- धार्मिक पहचान: नेपाल दुनिया का एकमात्र हिंदू राष्ट्र था; धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनने के बाद से पारंपरिक मूल्यों के संरक्षण को लेकर चिंताएं जताई जा रही हैं।
सरकार और राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
राजशाही समर्थकों के इस बढ़ते दबाव ने मौजूदा सरकार की चिंताएं बढ़ा दी हैं:
- प्रशासन की सख्ती: गृह मंत्रालय ने प्रदर्शनों को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है और संवेदनशील इलाकों में भारी पुलिस बल तैनात किया गया है।
- दलों का रुख: प्रमुख राजनीतिक दलों (माओवादी और नेपाली कांग्रेस) ने इस आंदोलन को ‘प्रतिगामी’ करार दिया है। उनका कहना है कि नेपाल अब राजशाही के युग में वापस नहीं लौटेगा।
- पूर्व नरेश की चुप्पी: पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह ने सीधे तौर पर इस आंदोलन का नेतृत्व नहीं किया है, लेकिन वे अक्सर सार्वजनिक कार्यक्रमों में देश की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त करते रहते हैं।




