मुंबई (14 मार्च, 2026): महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में प्रलोभन, बल प्रयोग और धोखाधड़ी के जरिए होने वाले अवैध धर्मांतरण को रोकने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। राज्य विधानसभा के मौजूदा सत्र के दौरान सरकार ने ‘अवैध मतांतरण निषेध विधेयक’ (Anti-Conversion Bill) पेश किया है। इस प्रस्तावित कानून का मुख्य उद्देश्य राज्य की सामाजिक समरसता को बनाए रखना और उन निर्दोष लोगों की रक्षा करना है जिन्हें शादी का झांसा देकर या आर्थिक लालच देकर जबरन धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया जाता है।
विधेयक के मुख्य प्रावधान: अब बचना होगा मुश्किल
विधानसभा में पेश किए गए इस बिल में अपराध की गंभीरता को देखते हुए सख्त सजा और जुर्माने का प्रावधान किया गया है:
- कठोर कारावास: जबरन या धोखाधड़ी से धर्मांतरण कराने के दोषियों को 3 साल से लेकर 10 साल तक की जेल की सजा दी जा सकती है।
- भारी जुर्माना: दोषियों पर ₹50,000 से लेकर ₹5 लाख तक का आर्थिक दंड भी लगाया जा सकता है।
- शादी के लिए धर्मांतरण: विधेयक में स्पष्ट किया गया है कि यदि केवल धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से विवाह किया जाता है, तो ऐसी शादियों को शून्य (Null and Void) घोषित किया जा सकता है।
- सामूहिक धर्मांतरण पर विशेष नजर: सामूहिक रूप से कराए जाने वाले अवैध धर्मांतरण के मामलों में सजा की अवधि और जुर्माने की राशि और भी अधिक रखी गई है।
धर्मांतरण के लिए लेनी होगी पूर्व अनुमति
नया कानून धर्मांतरण की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने पर जोर देता है:
- जिला मजिस्ट्रेट को सूचना: यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करना चाहता है, तो उसे कम से कम 30 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट (DM) को इसकी लिखित सूचना देनी होगी।
- धार्मिक गुरुओं की जिम्मेदारी: धर्म परिवर्तन कराने वाले व्यक्ति या धार्मिक गुरु को भी इस प्रक्रिया की पूर्व जानकारी प्रशासन को देनी अनिवार्य होगी।
- जांच का अधिकार: सूचना मिलने पर प्रशासन यह सुनिश्चित करेगा कि धर्मांतरण बिना किसी दबाव या लालच के किया जा रहा है।
विपक्ष का विरोध और सरकार का तर्क
सदन में इस बिल को लेकर तीखी बहस देखने को मिली:
- सरकार का रुख: उपमुख्यमंत्री ने बिल पेश करते हुए कहा कि यह कानून किसी खास धर्म के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह उन लोगों के खिलाफ है जो ‘धोखाधड़ी और डरा-धमकाकर’ धर्मांतरण के धंधे में शामिल हैं। उन्होंने इसे महिलाओं और वंचित वर्गों की सुरक्षा के लिए जरूरी बताया।
- विपक्ष की आशंकाएं: विपक्षी दलों ने इस विधेयक को संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार) के खिलाफ बताते हुए इसे वापस लेने की मांग की। विपक्ष का तर्क है कि इससे एक विशेष समुदाय को निशाना बनाया जा सकता है।





