Thursday, March 5, 2026

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दुनिया में महायुद्ध की आहट? ग्रीनलैंड को लेकर ‘वॉर मोड’ में ट्रंप; डेनमार्क को दी खुली चुनौती, द्वीप पर आधुनिक लड़ाकू विमानों की तैनाती का किया एलान

वाशिंगटन/कोपेनहेगन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही एक ऐसा फैसला लिया है जिसने पूरे यूरोप और विशेषकर नॉर्डिक देशों में हड़कंप मचा दिया है। ट्रंप ने ग्रीनलैंड, जो वर्तमान में डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है, पर अपना दावा मजबूत करने के लिए वहां भारी संख्या में अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों और सैन्य साजो-सामान की तैनाती का आदेश दिया है। ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका अब ग्रीनलैंड को केवल एक रणनीतिक साझेदार के रूप में नहीं, बल्कि अपनी सुरक्षा और संसाधनों के केंद्र के रूप में देखता है। उन्होंने डेनमार्क सरकार को कड़ा संदेश देते हुए कहा है कि ग्रीनलैंड की सुरक्षा और उसका भविष्य अब वाशिंगटन से तय होगा। इस कदम को अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ डेनमार्क की संप्रभुता पर सीधे प्रहार और ग्रीनलैंड पर ‘कब्जे’ की तैयारी के रूप में देख रहे हैं।

ग्रीनलैंड पर ट्रंप की नजर क्यों?

डोनाल्ड ट्रंप का ग्रीनलैंड के प्रति झुकाव नया नहीं है, लेकिन इस बार उनका लहजा सैन्य शक्ति के इस्तेमाल की ओर इशारा कर रहा है:

  • अथाह प्राकृतिक संसाधन: ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्रीनलैंड की बर्फ पिघल रही है, जिससे वहां छिपे सोने, हीरे, यूरेनियम और तेल के विशाल भंडार तक पहुंच आसान हो गई है। ट्रंप इन संसाधनों पर अमेरिकी एकाधिकार चाहते हैं।
  • चीन और रूस की घेराबंदी: आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए सबसे महत्वपूर्ण ‘फ्रंटलाइन’ है।
  • थुले एयर बेस का विस्तार: अमेरिका वहां पहले से मौजूद अपने ‘थुले एयर बेस’ को दुनिया के सबसे शक्तिशाली सैन्य अड्डे में तब्दील करने की योजना बना रहा है।

डेनमार्क और नाटो (NATO) के लिए धर्मसंकट

ट्रंप के इस एलान ने अमेरिका के सबसे पुराने सहयोगियों को ही उसके खिलाफ खड़ा कर दिया है:

  1. डेनमार्क का कड़ा विरोध: डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने ट्रंप के इस कदम को ‘बेतुका’ और ‘अवैध’ करार दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है और वहां की जनता अपनी किस्मत का फैसला खुद करेगी।
  2. नाटो में दरार: डेनमार्क नाटो का सदस्य है। अगर अमेरिका वहां जबरन सेना बढ़ाता है, तो यह नाटो के चार्टर का उल्लंघन होगा, जिससे पश्चिमी देशों का सैन्य गठबंधन टूट सकता है।
  3. लड़ाकू विमानों की तैनाती: ट्रंप ने घोषणा की है कि F-35 स्टील्थ फाइटर्स और बमवर्षक विमानों की अगली खेप जल्द ही ग्रीनलैंड के ठिकानों पर लैंड करेगी।

क्या यह ‘सॉफ्ट इन्वेजन’ (मृदु आक्रमण) है?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप ‘वॉर मोड’ की बात करके डेनमार्क पर दबाव बनाना चाहते हैं ताकि वे ग्रीनलैंड को अमेरिका को ‘पट्टे’ (Lease) पर देने या बेचने के लिए मजबूर हो जाएं।

  • आर्थिक दबाव: ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि अगर डेनमार्क सहयोग नहीं करता है, तो अमेरिका उसे दी जाने वाली सुरक्षा और व्यापारिक रियायतें रोक सकता है।
  • आर्कटिक की जंग: रूस ने पहले ही आर्कटिक में अपनी सेना बढ़ा रखी है, ऐसे में ट्रंप का यह कदम इस क्षेत्र को तीसरे विश्व युद्ध के अखाड़े में बदल सकता है।

 

ट्रंप के इस एलान ने अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीति की सीमाओं को चुनौती दी है। एक लोकतांत्रिक देश (डेनमार्क) के क्षेत्र पर दूसरे लोकतांत्रिक देश (अमेरिका) का इस तरह दावा ठोकना आधुनिक इतिहास में विरल है। अगर ट्रंप अपने वादे पर आगे बढ़ते हैं, तो यह यूरोप और अमेरिका के रिश्तों में कभी न भरने वाली दरार पैदा कर देगा। फिलहाल, डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सरकारें इस सैन्य तैनाती को रोकने के लिए यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रही हैं।

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