बीजिंग/जिनेवा।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दौर में लगाए गए उच्च टैरिफ और व्यापारिक तनाव के बीच चीन ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) में विकासशील देशों का दर्जा छोड़ने का संकेत दिया है। यह कदम चीन की वैश्विक व्यापार नीति और अमेरिका के साथ आर्थिक संतुलन पर गहरा असर डाल सकता है।
क्या है मामला?
चीन ने WTO को सूचित किया है कि वह अब विकासशील देश की तरह छूट और विशेष प्रावधान नहीं चाहता। इसके पीछे चीन की तर्क है कि अब उसकी अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत हो गई है कि उसे उन विशेष प्रावधानों की जरूरत नहीं है, जो छोटे और कमजोर देशों को वैश्विक व्यापार में लाभ दिलाने के लिए बनाए गए थे।
अमेरिका-चीन व्यापार विवाद का प्रभाव
डोनाल्ड ट्रंप के शासनकाल में अमेरिका ने चीन पर सैकड़ों अरब डॉलर के टैरिफ लगाए थे। अमेरिका का दावा था कि चीन ने व्यापार में अनुचित लाभ उठाया और उसकी घरेलू उद्योगों को नुकसान पहुँचाया। इस तनाव के बीच चीन का यह कदम वैश्विक व्यापार समुदाय के लिए भी संकेत है कि वह अब अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों के अनुसार खुद को विकसित देश के तौर पर पेश करेगा, जिससे अमेरिका जैसी शक्तियों के साथ व्यापारिक मामलों में चीन को कम रियायतें मिलेंगी।
WTO में प्रस्ताव
चीन ने WTO के अन्य सदस्य देशों को सूचित किया है कि वह जल्द ही आधिकारिक प्रस्ताव पेश करेगा, जिसमें विकासशील देशों के विशेष अधिकारों से खुद को अलग करने का तरीका बताया जाएगा। इसके लागू होने के बाद चीन को कुछ विकासशील देशों को मिलने वाले विशेष लाभ नहीं मिलेंगे, लेकिन इससे चीन की वैश्विक व्यापार भूमिका और ताकत और अधिक बढ़ सकती है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम चीन के वैश्विक आर्थिक प्रभुत्व और राजनीतिक शक्ति की तरफ एक और इशारा है। वहीं, अमेरिका और यूरोपीय देशों की नजर इस बदलाव पर है क्योंकि इससे वैश्विक व्यापार नियमों और ट्रेड वार्ड की रणनीतियों पर असर पड़ सकता है।
चीन की दलील
चीन ने कहा कि उसकी अर्थव्यवस्था अब विश्व स्तर पर तीसरे सबसे बड़े GDP वाले देश के तौर पर विकसित हो गई है। ऐसे में WTO के विकासशील देश के प्रावधानों का लाभ उठाना न्यायसंगत नहीं है। चीन का यह कदम अपने निर्यात और वैश्विक निवेशों पर लंबे समय में सकारात्मक प्रभाव डालने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।





