Wednesday, March 4, 2026

Top 5 This Week

Related Posts

ट्रंप की ‘टैरिफ नीति’ पर शशि थरूर ने उठाए सवाल: कहा- ’75 फीसदी टैक्स झेलना भारतीय कंपनियों के लिए नामुमकिन’; भारत के निर्यात और अर्थव्यवस्था पर गहराएगा संकट

नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत विदेशी वस्तुओं पर भारी टैरिफ लगाने के प्रस्ताव ने भारत में नई बहस छेड़ दी है। कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर ने इस संभावित फैसले पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि यदि कोई भी भारतीय कंपनी अपने उत्पादों पर 75 फीसदी तक का टैरिफ (टैक्स) भुगतने को मजबूर होती है, तो उसका अमेरिकी बाजार में टिके रहना असंभव हो जाएगा। थरूर के अनुसार, यह कदम न केवल भारतीय कंपनियों के मुनाफे को खत्म कर देगा, बल्कि इससे भारत के समग्र निर्यात और द्विपक्षीय व्यापारिक संबंधों पर भी विपरीत असर पड़ेगा।

शशि थरूर की मुख्य चिंताएं: व्यापारिक युद्ध की आहट?

थरूर ने ट्रंप के प्रस्तावित आर्थिक कदमों का विश्लेषण करते हुए निम्नलिखित बिंदुओं पर जोर दिया:

  • प्रतिस्पर्धा का अंत: थरूर ने तर्क दिया कि भारतीय सामान (जैसे आईटी सेवाएं, फार्मा और टेक्सटाइल) अपनी कम लागत और गुणवत्ता के कारण अमेरिका में लोकप्रिय हैं। 75% टैक्स लगने के बाद ये उत्पाद अमेरिकी बाजार में इतने महंगे हो जाएंगे कि कोई उन्हें खरीदेगा नहीं।
  • अर्थव्यवस्था को चोट: अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। यदि निर्यात में गिरावट आती है, तो इसका सीधा असर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार और रोजगार सृजन पर पड़ेगा।
  • जवाबी कार्रवाई का जोखिम: थरूर का मानना है कि यदि अमेरिका टैरिफ बढ़ाता है, तो भारत को भी जवाबी कार्रवाई करनी पड़ सकती है, जिससे दोनों देशों के बीच ‘ट्रेड वॉर’ (व्यापारिक युद्ध) छिड़ सकता है।

ट्रंप के फैसले का संभावित प्रभाव

डोनाल्ड ट्रंप का मानना है कि भारी टैरिफ लगाने से अमेरिकी कंपनियां वापस अपने देश में मैन्युफैक्चरिंग शुरू करेंगी, लेकिन भारत के लिए इसके मायने अलग हैं:

  1. आईटी और सेवा क्षेत्र: भारत की दिग्गज आईटी कंपनियां (TCS, Infosys) अमेरिकी क्लाइंट्स पर निर्भर हैं। खर्च बढ़ने से उनके प्रोजेक्ट्स और मार्जिन पर असर पड़ेगा।
  2. फार्मा और दवा उद्योग: भारत अमेरिका को बड़े पैमाने पर जेनेरिक दवाएं भेजता है। टैक्स बढ़ने से अमेरिका में स्वास्थ्य सेवाएं महंगी हो सकती हैं और भारतीय कंपनियों की मांग घट सकती है।
  3. छोटे उद्यमी: एमएसएमई (MSME) क्षेत्र, जो हस्तशिल्प और इंजीनियरिंग सामान भेजता है, इस आर्थिक झटके को झेलने में सक्षम नहीं होगा।

भारत सरकार के लिए चुनौती

शशि थरूर ने सुझाव दिया है कि भारत सरकार को इस मुद्दे पर अभी से कूटनीतिक सक्रियता दिखानी चाहिए:

  • बातचीत का रास्ता: सरकार को ट्रंप प्रशासन के साथ मिलकर एक ‘मिडल ग्राउंड’ (मध्य मार्ग) तलाशना होगा ताकि रणनीतिक साझेदार होने के नाते भारत को इन कड़े टैरिफ से छूट मिल सके।
  • बाजार का विविधीकरण: भारत को केवल अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय यूरोपीय संघ, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजारों में अपनी पकड़ और मजबूत करनी होगी।

निष्कर्ष: अनिश्चितता के दौर में भारतीय व्यापार

शशि थरूर का यह बयान ऐसे समय में आया है जब पूरी दुनिया ट्रंप के शपथ ग्रहण के बाद उनके पहले ‘आर्थिक प्रहार’ का इंतजार कर रही है। हालांकि ट्रंप और पीएम मोदी के बीच व्यक्तिगत संबंध अच्छे हैं, लेकिन थरूर का मानना है कि व्यापारिक हितों के मामले में व्यक्तिगत मित्रता की सीमाएं होती हैं। अब देखना यह होगा कि भारत सरकार ट्रंप की इस ‘टैरिफ चुनौती’ से निपटने के लिए क्या रणनीति तैयार करती है।

Popular Articles