ईरान और अमेरिका के बीच गहराते सैन्य और कूटनीतिक तनाव के बीच एक ऐसी घटना हुई है जिसने पूरी दुनिया के विशेषज्ञों को हैरान कर दिया है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने पिछले 37 वर्षों से चली आ रही एक महत्वपूर्ण परंपरा को तोड़ दिया है। दशकों बाद पहली बार, खामेनेई ने तेहरान में शुक्रवार के नमाज के खुतबे (भाषण) की कमान खुद संभाली है। कूटनीतिक हलकों में यह सवाल तेजी से गूंज रहा है कि क्या यह कदम डोनाल्ड ट्रंप की सत्ता में वापसी के डर से उठाया गया है, या फिर ईरान इजराइल और अमेरिका के साथ ‘आर-पार’ की जंग की तैयारी कर रहा है।
क्या है वह 37 साल पुरानी परंपरा?
ईरान की सत्ता संरचना में सर्वोच्च नेता आमतौर पर केवल अत्यंत महत्वपूर्ण या संकटपूर्ण स्थितियों में ही सार्वजनिक रूप से नमाज का नेतृत्व करते हैं:
- नियमित अंतराल: पिछले 37 सालों में खामेनेई ने गिने-चुने मौकों पर ही जुमे की नमाज का नेतृत्व किया है। सामान्यतः यह जिम्मेदारी उनके द्वारा नियुक्त इमामों की होती है।
- अंतिम बार का संदर्भ: इससे पहले उन्होंने 2020 में कासिम सुलेमानी की मौत के बाद नमाज का नेतृत्व किया था। अब दोबारा इस भूमिका में आना यह दर्शाता है कि ईरान इस समय खुद को एक ‘अस्तित्व के संकट’ (Existential Crisis) में देख रहा है।
परंपरा तोड़ने के पीछे के संभावित कारण
राजनीतिक विश्लेषकों ने इस असाधारण कदम के पीछे तीन मुख्य वजहें बताई हैं:
- ट्रंप की वापसी और दबाव: डोनाल्ड ट्रंप की ‘मैक्सिमम प्रेशर’ (अधिकतम दबाव) की नीति से ईरान पहले ही जूझ चुका है। अमेरिका में सत्ता परिवर्तन की आहट और ट्रंप के कड़े तेवरों ने तेहरान को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर किया है।
- इजराइल के साथ सीधा टकराव: हाल के दिनों में इजराइल द्वारा हिजबुल्लाह और हमास के शीर्ष नेताओं को निशाना बनाए जाने के बाद, खामेनेई खुद सामने आकर अपने समर्थकों और ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ को एकजुट रहने का संदेश देना चाहते हैं।
- आंतरिक स्थिरता का संदेश: ईरान के भीतर बढ़ रहे असंतोष और बाहरी खतरों के बीच, सर्वोच्च नेता का सार्वजनिक रूप से सामने आना देश की जनता को यह भरोसा दिलाना है कि शासन पूरी तरह मजबूत और सतर्क है।
खामेनेई के संबोधन के मायने
अपने संबोधन में खामेनेई ने अमेरिका को ‘शैतान’ करार देते हुए साफ कर दिया कि ईरान अपने परमाणु और सैन्य कार्यक्रम से पीछे नहीं हटेगा। उन्होंने संकेत दिया कि यदि अमेरिका या इजराइल ने कोई भी हिमाकत की, तो ईरान का पलटवार पहले से कहीं अधिक घातक होगा। इस भाषण को केवल एक धार्मिक संदेश नहीं, बल्कि एक ‘वॉर क्राई’ (युद्ध का आह्वान) के रूप में देखा जा रहा है।





