नई दिल्ली।
प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों को पद से हटाने का प्रावधान करने वाले तीन महत्वपूर्ण विधेयकों पर विचार के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस समिति का हिस्सा नहीं बनेगी। पार्टी ने जेपीसी को ‘तमाशा’ करार देते हुए कहा कि वह इस पर कोई सदस्य नामित नहीं करेगी।
केंद्र ने पेश किए तीन अहम विधेयक
केंद्र सरकार ने मानसून सत्र के दौरान केंद्र शासित प्रदेश सरकार (संशोधन) विधेयक 2025, संविधान (130वां संशोधन) विधेयक 2025 और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक 2025 लोकसभा में पेश किए थे। विपक्ष के भारी विरोध और हंगामे के बाद सरकार ने इन्हें संसद की संयुक्त समिति को भेजने का निर्णय लिया।
जेपीसी में लोकसभा के 21 और राज्यसभा के 10 सदस्य शामिल होंगे। समिति को अपनी रिपोर्ट संसद के आगामी शीतकालीन सत्र (संभावित नवंबर तीसरे सप्ताह) में पेश करनी है।
टीएमसी का बयान – ‘संविधान के खिलाफ कदम’
टीएमसी ने कहा कि वह 130वें संविधान संशोधन विधेयक का प्रस्ताव स्तर पर ही कड़ा विरोध करती है। पार्टी के अनुसार, जेपीसी के जरिये इस विधेयक को वैधता देने का प्रयास किया जा रहा है, जबकि यह लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करने वाला है। पार्टी ने साफ कहा कि इसीलिए वह इस समिति का हिस्सा नहीं बनेगी।
विधेयक का प्रावधान
प्रस्तावित संशोधन के अनुसार, यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री गंभीर आरोपों में लगातार 30 दिनों तक हिरासत/गिरफ्तारी में रहते हैं, तो उन्हें पद से हटाया जा सकेगा। सरकार का तर्क है कि यह व्यवस्था पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करेगी, वहीं विपक्ष इसे लोकतांत्रिक मूल्यों पर आघात बता रहा है।
ममता बनर्जी का तीखा हमला
टीएमसी प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले ही इन विधेयकों को लेकर कड़ा विरोध दर्ज करा चुकी हैं। उन्होंने आरोप लगाया था कि ये विधेयक “सुपर इमरजेंसी से भी आगे जाकर लोकतंत्र को खत्म करने की दिशा में उठाया गया कदम” हैं।
ममता ने कहा कि इसका उद्देश्य एक व्यक्ति और एक पार्टी की तानाशाही व्यवस्था थोपना है। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसे प्रावधान संविधान की मूल भावना और ढांचे को रौंद देंगे।





