Monday, February 9, 2026

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जस्टिस यशवंत वर्मा को सुप्रीम कोर्ट से नहीं मिली राहत: महाभियोग मामले में ‘स्पीकर की कमेटी’ की जांच रहेगी जारी; शीर्ष अदालत ने हस्तक्षेप से किया इनकार, याचिका खारिज

नई दिल्ली: न्यायमूर्ति (जस्टिस) यशवंत वर्मा के खिलाफ चल रही महाभियोग (Impeachment) की प्रक्रिया में उन्हें सर्वोच्च न्यायालय से बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) द्वारा गठित जांच समिति की वैधता को चुनौती देने वाली जस्टिस वर्मा की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संवैधानिक प्रक्रियाओं और विधायी शक्तियों के तहत गठित कमेटी की कार्यवाही में इस स्तर पर हस्तक्षेप करना उचित नहीं है। इस फैसले के बाद अब जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगे आरोपों की जांच का रास्ता साफ हो गया है, जिससे उनकी मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।

क्या है पूरा विवाद? (मामले की पृष्ठभूमि)

जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही एक गंभीर और दुर्लभ संवैधानिक प्रक्रिया है:

  • गंभीर आरोप: जस्टिस वर्मा पर पद के दुरुपयोग और कदाचार (Misconduct) के गंभीर आरोप लगाए गए हैं, जिसके बाद संसद के सदस्यों ने उनके खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव पेश किया था।
  • स्पीकर की कार्रवाई: नियमों के मुताबिक, लोकसभा अध्यक्ष ने इन आरोपों की सत्यता की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया। इस समिति में कानून के जानकारों और वरिष्ठ न्यायाधीशों को शामिल किया गया है।
  • याचिका का आधार: जस्टिस वर्मा ने अपनी याचिका में तर्क दिया था कि कमेटी के गठन की प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी की गई है और यह उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत की पीठ ने कड़ा रुख अपनाया:

  1. संसदीय संप्रभुता: अदालत ने कहा कि जब मामला महाभियोग जैसी संवैधानिक प्रक्रिया से जुड़ा हो और संसद के अधिकार क्षेत्र में हो, तो न्यायपालिका को प्रक्रिया पूरी होने से पहले दखल नहीं देना चाहिए।
  2. जवाबदेही जरूरी: पीठ ने रेखांकित किया कि उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों की जवाबदेही तय करने के लिए बनी समितियों को अपना काम स्वतंत्र रूप से करने देना चाहिए।
  3. हस्तक्षेप का अभाव: अदालत ने याचिका में कोई ठोस कानूनी आधार नहीं पाया, जिसके कारण इसे तत्काल प्रभाव से खारिज कर दिया गया।

अब आगे क्या होगा? (महाभियोग की प्रक्रिया)

सुप्रीम कोर्ट से याचिका खारिज होने के बाद अब गेंद पूरी तरह संसद के पाले में है:

  • जांच रिपोर्ट: स्पीकर द्वारा गठित कमेटी अब अपनी जांच पूरी कर रिपोर्ट सौंपेगी। यदि रिपोर्ट में आरोप सिद्ध पाए जाते हैं, तो महाभियोग प्रस्ताव पर संसद के दोनों सदनों में मतदान होगा।
  • संवैधानिक प्रावधान: महाभियोग को पारित करने के लिए संसद के प्रत्येक सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।

 

भारत के न्यायिक इतिहास में बहुत कम ऐसे अवसर आए हैं जब किसी न्यायाधीश को महाभियोग का सामना करना पड़ा हो। जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट के इस रुख ने साफ कर दिया है कि संवैधानिक संस्थानों द्वारा की जाने वाली जांच में न्यायपालिका केवल तभी दखल देगी जब कानून का स्पष्ट उल्लंघन दिखाई दे। फिलहाल, सबकी नजरें अब जांच समिति की रिपोर्ट पर टिकी हैं।

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