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जसवंत सिंह खालड़ा की लड़ाई फिर चर्चा में, ‘सतलुज’ फिल्म से सामने आई मानवाधिकार संघर्ष की कहानी

नई दिल्ली। पंजाबी फिल्म ‘सतलुज’ को लेकर उठे विवाद के बीच मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा और उनकी पत्नी परमजीत कौर खालड़ा के लंबे न्यायिक संघर्ष की कहानी एक बार फिर चर्चा में है। फिल्म खालड़ा के जीवन और 1990 के दशक में पंजाब में कथित फर्जी मुठभेड़ों तथा गुप्त अंतिम संस्कारों के खुलासे पर आधारित है।

जसवंत सिंह खालड़ा ने अमृतसर और तरनतारन क्षेत्र के श्मशान घाटों के रिकॉर्ड का अध्ययन कर दावा किया था कि आतंकवाद विरोधी अभियान के दौरान बड़ी संख्या में अज्ञात लोगों के शवों का बिना परिजनों को सूचना दिए अंतिम संस्कार किया गया। उनके खुलासों ने देश और विदेश में मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी थी।

सितंबर 1995 में खालड़ा का अमृतसर स्थित उनके घर के बाहर से अपहरण कर लिया गया। बाद में मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपी गई। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद अदालत ने पंजाब पुलिस के कई अधिकारियों को उनके अपहरण और हत्या का दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई।

खालड़ा के लापता होने के बाद उनकी पत्नी परमजीत कौर खालड़ा ने न्याय की लड़ाई जारी रखी। उन्होंने वर्षों तक अदालतों का दरवाजा खटखटाया और मामले को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया। उनके लगातार प्रयासों के बाद ही जांच आगे बढ़ी और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई संभव हो सकी।

इधर, दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’, जो पहले ‘पंजाब 95’ नाम से बनाई गई थी, हाल ही में ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज होने के कुछ समय बाद भारत में उपलब्ध नहीं रही। फिल्म को लेकर फिर से खालड़ा के जीवन, उनके संघर्ष और न्याय की लड़ाई पर चर्चा तेज हो गई है।

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