बीजिंग/नई दिल्ली। पिछले कुछ दशकों में अपनी शानदार आर्थिक प्रगति से दुनिया को चकाचौंध करने वाले चीन के भीतर एक बड़ा वित्तीय संकट गहराता जा रहा है। एक चौंकाने वाली अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन की अर्थव्यवस्था, जो दुनिया के दूसरे देशों को भारी-भरकम कर्ज बांटने के लिए जानी जाती है, खुद कर्ज के पहाड़ के नीचे दबी हुई है। इस ‘काले सच’ ने वैश्विक बाजारों और अर्थशास्त्रियों की चिंता बढ़ा दी है।
GDP का 300 प्रतिशत तक पहुँचा कुल कर्ज
रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, चीन का कुल सार्वजनिक और निजी कर्ज उसकी सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 300 प्रतिशत के करीब पहुंच गया है। इसमें सबसे चिंताजनक पहलू ‘हिडन डेट’ यानी छिपा हुआ कर्ज है, जो स्थानीय सरकारों और सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों के माध्यम से लिया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि चीन ने बुनियादी ढांचे के विकास पर जरूरत से ज्यादा खर्च किया है, जिससे अब आय कम और देनदारी अधिक हो गई है।
रियल एस्टेट सेक्टर का धराशायी होना
चीन की अर्थव्यवस्था का लगभग 25 से 30 प्रतिशत हिस्सा रियल एस्टेट क्षेत्र से आता है। एवरग्रांडे (Evergrande) और कंट्री गार्डन जैसी दिग्गज कंपनियों के दिवालिया होने की कगार पर पहुँचने से बैंकिंग प्रणाली पर भारी दबाव पड़ा है। चीन के शहरों में लाखों अधूरे पड़े मकान और ‘घोस्ट टाउन’ (वीरान शहर) इस बात के गवाह हैं कि वहां का प्रॉपर्टी मार्केट बुरी तरह चरमरा चुका है।
एलजीएफवी (LGFV) का बड़ा खतरा
चीन में सबसे बड़ा संकट लोकल गवर्नमेंट फाइनेंसिंग व्हीकल्स (LGFVs) से जुड़ा है। स्थानीय सरकारों ने अपनी परियोजनाओं को वित्तपोषित करने के लिए इन संस्थाओं के माध्यम से खरबों डॉलर का कर्ज लिया है। यह कर्ज आधिकारिक बैलेंस शीट पर दिखाई नहीं देता, लेकिन अब इन किस्तों को चुका पाना नामुमकिन होता जा रहा है।
दूसरे देशों को बांट रहा कर्ज, अपने घर में मंदी
हैरानी की बात यह है कि एक ओर चीन ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) के जरिए एशिया और अफ्रीका के गरीब देशों को भारी ब्याज पर कर्ज बांटकर उन्हें ‘डेब्ट ट्रैप’ में फंसा रहा है, तो दूसरी ओर उसके अपने बैंकों के पास पूंजी की कमी होने लगी है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि चीन का यह ‘डेब्ट बबल’ (कर्ज का बुलबुला) फटा, तो इसका असर केवल चीन पर ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की सप्लाई चेन पर पड़ेगा।
क्या होगा वैश्विक असर?
चीन की अर्थव्यवस्था में मंदी का मतलब है दुनिया भर में कच्चे माल की मांग में कमी और वित्तीय बाजारों में अस्थिरता। चीन अब अपनी गिरती विकास दर को संभालने के लिए संघर्ष कर रहा है। जनसंख्या में गिरावट और बेरोजगारी (विशेषकर युवाओं में) ने इस संकट को और अधिक गंभीर बना दिया है।





