देहरादून/गैरसैंण: उत्तराखंड की प्रसिद्ध चारधाम यात्रा और केदारनाथ धाम की परंपराओं को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। सोशल मीडिया पर केदारनाथ धाम की प्राचीन ‘रूप छड़ी’ और ‘मुकुट’ के गायब होने की चर्चाओं ने शासन से लेकर धार्मिक हलकों तक हड़कंप मचा दिया है। इस संवेदनशील मामले पर संज्ञान लेते हुए प्रदेश के पर्यटन एवं धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज ने आधिकारिक जांच की घोषणा की है, वहीं केदारनाथ के रावल ने इन दावों को पूरी तरह निराधार बताते हुए अपना स्पष्टीकरण जारी किया है।
मंत्री सतपाल महाराज का रुख: “तथ्यों की होगी जांच”
मंगलवार को विधानसभा सत्र की कार्यवाही के बाद मीडिया से बातचीत में मंत्री सतपाल महाराज ने कहा कि केदारनाथ धाम की बहुमूल्य धार्मिक वस्तुओं के संबंध में जो भी भ्रामक खबरें या चर्चाएं चल रही हैं, सरकार उनकी गंभीरता से जांच कराएगी। उन्होंने आश्वस्त किया कि मंदिर की किसी भी ऐतिहासिक या धार्मिक धरोहर के साथ कोई लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी और जांच के बाद स्थिति स्पष्ट कर दी जाएगी।
रावल भीमाशंकर लिंग का स्पष्टीकरण: “प्राचीन परंपराओं का हिस्सा”
सोशल मीडिया पर उठ रहे सवालों के जवाब में केदारनाथ धाम के रावल भीमाशंकर लिंग ने अपना पक्ष रखते हुए इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि लगाए जा रहे आरोप पूरी तरह आधारहीन हैं। रावल ने परंपराओं का हवाला देते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातें कहीं:
- पांच प्रमुख पीठों का महत्व: रावल ने बताया कि वीरशैव लिंगायत धर्म में पांच प्रमुख प्राचीन पीठ (रामभपुरी, उज्जैनी, केदार, श्रीशैल और काशी) हैं। इनमें से केदार पीठ (ऊखीमठ) एक ‘वैराग्य पीठ’ है, जिसकी परंपराएं चारों युगों से चली आ रही हैं।
- धर्म प्रचार का अधिकार: उन्होंने स्पष्ट किया कि धार्मिक परंपरा के अनुसार, धर्म प्रचार के लिए रावल को रूप छड़ी, मुकुट और अन्य पवित्र धार्मिक सामग्रियों को अपने साथ ले जाने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है।
- शीतकालीन परंपरा: कपाट बंद होने के बाद, शीतकाल में ऊखीमठ स्थित ओंकारेश्वर मंदिर में मुकुट धारण करने की विशेष परंपरा निभाई जाती है। इसी परंपरा के निर्वहन के लिए वे धार्मिक कार्यक्रमों में इन पवित्र वस्तुओं के साथ शामिल होते हैं।





