केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति और राज्यपालों पर विधेयकों को मंजूरी देने के लिए समय-सीमा थोपने के खिलाफ चेतावनी जारी की है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि ऐसा कदम संविधान में निहित शक्तियों के पृथक्करण को कमजोर कर सकता है और देश में संवैधानिक अराजकता पैदा कर सकता है।
अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट की जेबी पारदीवाला और आर. महादेवन की पीठ ने राष्ट्रपति के लिए तीन महीने और राज्यपालों के लिए एक महीने की समय-सीमा तय करने का सुझाव दिया था। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि राज्यपाल और राष्ट्रपति के पद राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हैं और किसी भी कथित चूक का समाधान राजनीतिक और संवैधानिक तंत्र के माध्यम से होना चाहिए, न कि अनावश्यक न्यायिक हस्तक्षेप से।
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार की याचिका पर दिए अपने सुझाव में कहा था कि राष्ट्रपति को राज्यपालों द्वारा भेजे गए लंबित विधेयकों पर तीन महीने के भीतर निर्णय लेना चाहिए। यदि इस समय में विलंब होता है, तो उचित कारण देकर संबंधित राज्य को सूचित करना आवश्यक है।





