Sunday, November 30, 2025

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‘कुछ भारतीय लोग अपनी ही भाषा नहीं जानते’, मोहन भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने भारतीय भाषाओं और मातृभाषा के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि आज एक बड़ी संख्या में भारतीय अपनी ही भाषा को सही ढंग से नहीं जानते। उन्होंने इसे चिंता का विषय बताते हुए कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और हमारी पहचान का आधार है। यदि लोग अपनी भाषा से ही दूर होते जाएंगे, तो सांस्कृतिक विरासत कमजोर पड़ जाएगी।

एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि वैश्वीकरण की इस तेज रफ्तार दुनिया में अंग्रेजी और अन्य विदेशी भाषाओं का महत्व बढ़ा है, लेकिन इसके कारण भारतीय भाषाओं की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि कई बार लोग अपनी भाषा बोलने में संकोच महसूस करते हैं, जबकि अपनी मातृभाषा पर गर्व होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि भाषा ज्ञान की सबसे पहली सीढ़ी है, इसलिए बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में दी जानी चाहिए।

भागवत ने इस बात पर खास ध्यान दिलाया कि भारतीय भाषाएं केवल भावनात्मक ही नहीं, बल्कि बौद्धिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक शोध हो या प्रशासनिक व्यवस्था—जहां भी मातृभाषा का उपयोग बढ़ेगा, वहां समझ अधिक स्पष्ट होगी और लोगों की भागीदारी भी बढ़ेगी। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कई विकसित देशों में लोग अपनी मूल भाषा में ही उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफल होते हैं। इसलिए भारत में भी भाषाई आत्मविश्वास को बढ़ावा देना समय की मांग है।

अपने संबोधन में आरएसएस प्रमुख ने सुझाव दिया कि परिवारों और शैक्षणिक संस्थानों को भाषा संरक्षण की दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने कहा कि घर–परिवार में मातृभाषा का उपयोग बढ़ाया जाए, स्थानीय साहित्य पढ़ने की परंपरा को आगे बढ़ाया जाए और भारतीय भाषाओं में उपलब्ध ज्ञान–विज्ञान को अधिक सुलभ बनाया जाए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भाषा की मजबूती से ही राष्ट्र की पहचान मजबूत होती है।

भागवत ने कहा कि भारतीय भाषाओं की समृद्धता, विविधता और ऐतिहासिक गहराई अद्वितीय है। इसलिए इन्हें केवल बोलचाल तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि प्रशासन, शिक्षा, तकनीक और शोध के क्षेत्रों में भी मजबूत स्थान देना चाहिए। उन्होंने देशवासियों से अपील करते हुए कहा कि अपनी भाषा के प्रति गर्व की भावना जागृत करनी होगी, तभी हम समाज और संस्कृति को सही अर्थों में समृद्ध बना सकेंगे।

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