नई दिल्ली। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा है कि वास्तविक समानता की शुरुआत प्रत्येक नागरिक को कानून और न्याय तक समान पहुंच उपलब्ध कराने से होती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि न्याय व्यवस्था तभी सार्थक मानी जाएगी, जब समाज के हर वर्ग को बिना किसी भेदभाव के न्याय प्राप्त करने का समान अवसर मिले।
रूस में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय विधिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए सीजेआई ने कहा कि समानता केवल संवैधानिक सिद्धांत या कानूनी प्रावधान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसका लाभ आम नागरिकों तक व्यवहारिक रूप से पहुंचना चाहिए। उन्होंने कहा कि न्याय तक पहुंच केवल औपचारिक अधिकार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल आधारशिला है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि भारत की प्राचीन न्यायिक और दार्शनिक परंपराओं में समानता के विचार को बहुत पहले ही महत्व दिया गया था। उन्होंने उल्लेख किया कि कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में भी शासन और न्याय व्यवस्था में समानता के सिद्धांतों का उल्लेख मिलता है, जो यह दर्शाता है कि भारतीय सभ्यता में न्याय और समानता की अवधारणा गहरी जड़ें रखती है।
उन्होंने कहा कि आधुनिक न्याय प्रणाली का उद्देश्य केवल कानून बनाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि प्रत्येक व्यक्ति उन कानूनों का समान रूप से लाभ उठा सके। इसके लिए न्याय तक आसान पहुंच, प्रभावी कानूनी सहायता और पारदर्शी न्यायिक व्यवस्था आवश्यक है।
सीजेआई ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से न्याय, समानता और विधि के शासन को मजबूत करने के लिए सहयोग बढ़ाने का भी आह्वान किया। उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर न्यायिक संस्थानों के बीच अनुभवों का आदान-प्रदान न्याय व्यवस्था को अधिक प्रभावी और जनोन्मुख बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
उन्होंने विश्वास जताया कि समान अवसर, निष्पक्ष न्याय और कानून के समक्ष बराबरी की भावना ही लोकतंत्र को मजबूत बनाने का सबसे प्रभावी माध्यम है।





