Thursday, March 5, 2026

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कर्नाटक में चुनावी सुधारों की सुगबुगाहट: एक साथ हो सकते हैं सभी स्थानीय निकाय चुनाव; 30 साल बाद फिर लौट सकता है ‘बैलट पेपर’ का दौर

बेंगलुरु: कर्नाटक में स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर एक बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। राज्य की सिद्धारमैया सरकार प्रदेश के सभी नगर निगमों, नगर पालिकाओं और पंचायतों के चुनाव एक साथ कराने की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार कर रही है। इससे भी अधिक चर्चा का विषय यह है कि सरकार इन चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के बजाय पारंपरिक बैलट पेपर (मतपत्र) के इस्तेमाल पर विचार कर रही है। यदि ऐसा होता है, तो कर्नाटक में लगभग तीन दशक यानी 30 साल बाद मतदाता एक बार फिर ठप्पा लगाकर अपना जनप्रतिनिधि चुनेंगे। राजनीतिक गलियारों में इस संभावित कदम को ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ की तर्ज पर ‘वन स्टेट, वन लोकल पोल’ के प्रयोग के रूप में देखा जा रहा है।

एक साथ चुनाव कराने के पीछे का तर्क

सरकार का मानना है कि अलग-अलग समय पर होने वाले चुनावों से विकास कार्य और प्रशासनिक मशीनरी पर विपरीत प्रभाव पड़ता है:

  • खर्च में कटौती: अलग-अलग चरणों में चुनाव कराने से सरकारी खजाने पर भारी बोझ पड़ता है। एक साथ चुनाव होने से सुरक्षा और चुनावी ड्यूटी पर होने वाले खर्च को काफी हद तक कम किया जा सकेगा।
  • आचार संहिता से राहत: बार-बार चुनाव होने के कारण साल के कई महीने ‘आचार संहिता’ (Model Code of Conduct) लागू रहती है, जिससे विकास योजनाएं ठप हो जाती हैं। एकमुश्त चुनाव इस समस्या का समाधान बन सकते हैं।

बैलट पेपर की वापसी: क्या है रणनीति?

EVM के दौर में मतपत्रों की ओर वापस लौटने के प्रस्ताव ने नई बहस छेड़ दी है:

  1. विपक्ष और जनता का भरोसा: सरकार के कुछ धड़ों का तर्क है कि स्थानीय स्तर पर बैलट पेपर से चुनाव कराने पर जनता का चुनावी प्रक्रिया में विश्वास बढ़ता है और धांधली के आरोपों की गुंजाइश कम रहती है।
  2. 30 साल का अंतराल: कर्नाटक में आखिरी बार 1990 के दशक के मध्य में बड़े पैमाने पर बैलट पेपर का उपयोग हुआ था। इसके बाद धीरे-धीरे सभी स्तरों पर EVM ने जगह ले ली थी।
  3. तकनीकी चुनौतियां: हालांकि, बैलट पेपर के इस्तेमाल से मतगणना (Counting) में अधिक समय लगेगा और भारी मात्रा में कागजी कार्रवाई की आवश्यकता होगी।

विपक्ष का रुख और कानूनी अड़चनें

इस संभावित फैसले पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) और अन्य विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है:

  • EVM पर अविश्वास का आरोप: विपक्ष का कहना है कि बैलट पेपर की ओर लौटना पीछे की ओर कदम बढ़ाना है और यह चुनाव प्रक्रिया को धीमा करने की साजिश है।
  • अदालती कार्यवाही: कई स्थानीय निकायों का कार्यकाल पहले ही समाप्त हो चुका है और मामला कोर्ट में लंबित है। ऐसे में सभी चुनाव एक साथ कराने के लिए सरकार को कानूनी बाधाओं को पार करना होगा।

निष्कर्ष: कर्नाटक बनेगा प्रयोगशाला?

अगर कर्नाटक सरकार इस योजना को लागू करती है, तो यह देश के अन्य राज्यों के लिए एक उदाहरण या चर्चा का विषय बन सकता है। एक साथ चुनाव कराना और बैलट पेपर का पुनरागमन, दोनों ही फैसले राज्य की राजनीति की दिशा और दशा बदल सकते हैं। फिलहाल, राज्य चुनाव आयोग और विधि विभाग इस प्रस्ताव की व्यवहार्यता (Feasibility) की जांच कर रहे हैं।

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