नई दिल्ली/ब्यूरो: राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल ने नई दिल्ली में देश के विभिन्न हिस्सों से आए प्रमुख सूफी संतों और आध्यात्मिक गुरुओं के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक की। इस मुलाकात का मुख्य केंद्र बिंदु देश में बढ़ते कट्टरपंथ (Radicalization) की चुनौतियों से निपटना और युवाओं को गुमराह होने से बचाना था। बैठक में सूफी संतों ने स्पष्ट किया कि इस्लाम का वास्तविक स्वरूप शांति और प्रेम है, और कट्टरपंथी विचारधारा का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है।
मुलाकात के मुख्य एजेंडे: कट्टरपंथ पर प्रहार
बैठक के दौरान एनएसए अजीत डोभाल और सूफी नेताओं के बीच कई संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा हुई:
- युवाओं को बचाने की मुहिम: डोभाल ने इस बात पर जोर दिया कि सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से फैलाए जा रहे कट्टरपंथी विमर्श को केवल सुरक्षा एजेंसियां नहीं, बल्कि आध्यात्मिक नेता ही अपने उपदेशों से रोक सकते हैं।
- सूफीवाद का महत्व: बैठक में यह सहमति बनी कि ‘सूफी मत’ हमेशा से भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है, जो सहिष्णुता और समावेशिता को बढ़ावा देता है। कट्टरवाद को मात देने के लिए सूफी विचारधारा को और अधिक प्रसारित करने की आवश्यकता है।
- सांप्रदायिक सौहार्द: संतों ने आश्वासन दिया कि वे दरगाहों और खानकाहों के माध्यम से देश की एकता और अखंडता का संदेश जन-जन तक पहुंचाएंगे।
सुरक्षा और शांति पर ‘साझा रोडमैप’
अजीत डोभाल ने सूफी प्रतिनिधिमंडल को संबोधित करते हुए कहा कि भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सभी समुदायों का मिलकर रहना अनिवार्य है।
- राष्ट्र विरोधी ताकतों की पहचान: चर्चा में इस बात पर गौर किया गया कि कुछ बाहरी ताकतें देश के युवाओं के मन में जहर घोलने का प्रयास कर रही हैं। संतों ने ऐसे तत्वों की पहचान करने और उन्हें सामाजिक रूप से अलग-थलग करने में सहयोग का वादा किया।
- संवाद की शक्ति: डोभाल ने सूफी संतों के ‘इंटर-फेथ संवाद’ (Inter-faith dialogue) की सराहना की, जो विभिन्न समुदायों के बीच की दूरियों को कम करने में सहायक है।
प्रतिनिधिमंडल में शामिल प्रमुख हस्तियां
इस बैठक में ऑल इंडिया सूफी सज्जादानशीन काउंसिल (AISSC) के प्रतिनिधि और अजमेर शरीफ, निज़ामुद्दीन औलिया सहित देश की प्रमुख दरगाहों के गद्दीनशीन शामिल थे।
- संतों का रुख: सूफी संतों ने सामूहिक स्वर में कहा कि “हमारा देश ‘अनेकता में एकता’ की मिसाल है। हम किसी भी ऐसी विचारधारा को पनपने नहीं देंगे जो हमारे राष्ट्र की शांति को भंग करती हो।”
निष्कर्ष: सुशासन और विश्वास का संदेश
विशेषज्ञ इस बैठक को सरकार की उस रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं, जिसमें सुरक्षा के साथ-साथ ‘सॉफ्ट पावर’ और आध्यात्मिक संवाद के जरिए आंतरिक चुनौतियों का समाधान ढूंढने का प्रयास किया जाता है। एनएसए और सूफी संतों की यह जुगलबंदी कट्टरवाद के खिलाफ एक मजबूत ढाल साबित हो सकती है।





