Monday, February 16, 2026

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एनआइआरएफ रैंकिंग में होगी निगेटिव मार्किंग, शोध पत्र वापस लेने पर कसेगा शिकंजा

नई दिल्ली। देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों की राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क (एनआइआरएफ) में अब बड़ा बदलाव होने जा रहा है। सरकार ने शोध की गुणवत्ता सुधारने और गलत प्रथाओं पर अंकुश लगाने के लिए निगेटिव मार्किंग की व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया है। इसका मतलब यह है कि शोध पत्र वापस लेने या खराब शोध कार्य से उद्धरण पाने वाले संस्थानों की रैंकिंग में अंक कट जाएंगे।
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने एनआइआरएफ के दसवें संस्करण की घोषणा करते हुए कहा कि यह कदम उच्च शिक्षा में पारदर्शिता और गुणवत्ता सुनिश्चित करने की दिशा में उठाया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि देश की शिक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए कठोर मानदंड जरूरी हैं।
एनबीए (नेशनल एक्रीडिशन बोर्ड) के अध्यक्ष अनिल सहस्त्रबुद्धे ने जानकारी दी कि यह पहली बार है जब एनआइआरएफ की रैंकिंग पद्धति में औपचारिक रूप से दंडात्मक प्रावधान जोड़े जा रहे हैं। उन्होंने कहा, “कई संस्थानों में बीते दो-तीन वर्षों से बड़ी संख्या में शोध पत्र वापस लिए जा रहे हैं। ऐसे संस्थानों की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में है। जब तक निगेटिव मार्किंग नहीं होगी, इस प्रवृत्ति पर रोक लगाना मुश्किल है।”
पांच व्यापक मानदंडों पर मूल्यांकन
एनआइआरएफ के तहत शिक्षण संस्थानों का मूल्यांकन पाँच प्रमुख मानदंडों पर होता है – सीखना और सिखाना, स्नातक परिणाम, शोध, पहुंच और धारणा। 2024 में इसमें 8,700 से अधिक संस्थानों ने भाग लिया था। इस रैंकिंग को छात्र, नियोक्ता और नीति-निर्माता एक व्यापक संदर्भ पैमाने के रूप में देखते हैं।
अब तक एनआइआरएफ में कभी भी निगेटिव मार्किंग नहीं रही है। वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित क्यूएस और टाइम्स हायर एजुकेशन जैसी रैंकिंग प्रणालियों में शोध पत्रों की वापसी को विशेष महत्व नहीं दिया जाता, जिसके कारण कई संस्थान बड़ी संख्या में शोध पत्र वापस लेने के बावजूद रैंकिंग में आगे बने रहते हैं।
अदालत तक पहुंचा था मामला
एनआइआरएफ की पारदर्शिता पर सवाल उठाने का मुद्दा हाल ही में मद्रास हाई कोर्ट तक पहुंचा था। अप्रैल में दायर एक जनहित याचिका में आरोप लगाया गया था कि एनआइआरएफ रैंकिंग केवल संस्थानों द्वारा अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध कराए गए आंकड़ों पर आधारित है और न तो इनका कोई स्वतंत्र सत्यापन होता है और न ही आडिटिंग।
अदालत ने इस पर अंतरिम रोक भी लगाई थी, हालांकि केंद्र सरकार के हस्तक्षेप और आश्वासन के बाद यह रोक हटा ली गई। केंद्र ने अदालत को बताया कि रैंकिंग तैयार करने की प्रक्रिया वैज्ञानिक और विशेषज्ञ निकायों की सिफारिशों के आधार पर की जाती है।
नया अध्याय शुरू
विशेषज्ञों का मानना है कि निगेटिव मार्किंग लागू होने से भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली में शोध की गुणवत्ता में सुधार होगा और संस्थानों को जवाबदेह बनाने में मदद मिलेगी। साथ ही यह कदम देश की वैश्विक अकादमिक साख को भी मजबूत करेगा।

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