देहरादून: उत्तराखंड में लंबे समय से चर्चा का विषय रहे ‘घोस्ट विलेज’ यानी जनशून्य हो चुके गांवों की वास्तविक स्थिति अब आगामी जनगणना के माध्यम से स्पष्ट होगी। राज्य सरकार और जनगणना विभाग ने इस दिशा में कमर कस ली है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि पिछले एक दशक में पलायन की मार ने कितने और गांवों को अस्तित्व के संकट में डाल दिया है। यह डेटा न केवल राज्य की जनसांख्यिकीय स्थिति को दर्शाएगा, बल्कि भविष्य की विकास योजनाओं और पलायन निवारण नीतियों के लिए आधार स्तंभ बनेगा।
क्या हैं ‘घोस्ट विलेज’ और क्यों बढ़ी इनकी संख्या?
पलायन आयोग और स्थानीय प्रशासन की शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार, घोस्ट विलेज उन गांवों को कहा जाता है जहाँ अब कोई भी स्थायी निवासी नहीं बचा है:
- बुनियादी सुविधाओं का अभाव: स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के अवसरों की कमी के कारण पहाड़ी क्षेत्रों से मैदानी इलाकों की ओर पलायन लगातार जारी है।
- खेती-बाड़ी का संकट: जंगली जानवरों के आतंक और सिंचाई के साधनों की कमी ने ग्रामीणों को खेती छोड़ने पर मजबूर कर दिया है, जिससे गांवों में रौनक खत्म हो गई है।
- खंडहर होते घर: कई गांवों में स्थिति इतनी विकट है कि वहां अब केवल खंडहर हो चुके मकान ही शेष बचे हैं, जिन्हें ‘भूतिया गांव’ या ‘घोस्ट विलेज’ की संज्ञा दी जा रही है।
आगामी जनगणना की मुख्य विशेषताएं
इस बार की जनगणना में पलायन के पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है:
- गाँव-वार मैपिंग: प्रगणक प्रत्येक राजस्व ग्राम में जाकर वहां मौजूद परिवारों और खाली पड़े मकानों की गणना करेंगे।
- पलायन का पैटर्न: जनगणना के दौरान यह भी ट्रैक किया जाएगा कि लोग अपने मूल स्थान को छोड़कर राज्य के भीतर ही अन्य शहरों (जैसे देहरादून, हल्द्वानी) में बसे हैं या राज्य से बाहर चले गए हैं।
- डिजिटल डेटा संग्रह: इस बार डेटा को डिजिटल माध्यम से एकत्रित किया जा रहा है, जिससे घोस्ट विलेज की सटीक सूची तैयार करने में पारदर्शिता और तेजी आएगी।
पलायन आयोग की पिछली रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़े
पूर्व में पलायन आयोग द्वारा जारी आंकड़ों ने पहले ही चिंता बढ़ा दी थी:
- आयोग के अनुसार, राज्य में लगभग 1,000 से अधिक गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं या वहां निवासियों की संख्या नगण्य (10 से कम) रह गई है।
- पौड़ी और अल्मोड़ा जैसे जिले पलायन की मार से सबसे अधिक प्रभावित पाए गए हैं।
- आगामी जनगणना इन पुरानी रिपोर्टों की पुष्टि करेगी और नए उभरते खाली क्षेत्रों की पहचान करेगी।





