Saturday, January 31, 2026

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उत्तराखंड पुलिस की बढ़ेगी ‘डिजिटल ताकत’: गढ़वाल और कुमाऊं मंडल को जल्द मिलेंगी ‘हाइटेक मोबाइल फॉरेंसिक लैब’; मौके पर ही होगी वैज्ञानिक जांच

देहरादून: उत्तराखंड में कानून व्यवस्था को और अधिक चुस्त-दुरुस्त बनाने तथा अपराधों की गुत्थी को वैज्ञानिक तरीके से सुलझाने के लिए राज्य सरकार ने ‘हाइटेक मोबाइल फॉरेंसिक साइंस लैब’ (Mobile Forensic Science Lab) परियोजना को मंजूरी दे दी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के विजन के अनुरूप, जल्द ही प्रदेश के दोनों मंडलों—गढ़वाल और कुमाऊं—को ये अत्याधुनिक वैन मिल जाएंगी। इन मोबाइल लैब के आने से पुलिस को जघन्य अपराधों के मामलों में डीएनए सैंपलिंग, फिंगरप्रिंट और अन्य महत्वपूर्ण साक्ष्यों के लिए मुख्य लैब पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। अधिकारियों का मानना है कि यह कदम न केवल जांच में तेजी लाएगा, बल्कि अपराधियों को सजा दिलाने की दर (Conviction Rate) में भी उल्लेखनीय सुधार करेगा।

कैसी होगी यह ‘हाइटेक मोबाइल लैब’?

यह चलता-फिरता फॉरेंसिक केंद्र अत्याधुनिक उपकरणों से लैस होगा, जिसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • ऑन-द-स्पॉट जांच: इस वैन में ऐसे उपकरण होंगे जो घटनास्थल पर ही रक्त के नमूने, विस्फोटक के अवशेष और नशीले पदार्थों की शुरुआती जांच करने में सक्षम होंगे।
  • डिजिटल फॉरेंसिक टूल्स: साइबर अपराधों और मोबाइल डाटा रिकवरी के लिए इसमें विशेष सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर किट मौजूद रहेगी।
  • सुरक्षित स्टोरेज: एकत्रित किए गए जैविक साक्ष्यों (Biological Samples) को सुरक्षित रखने के लिए इसमें ‘कोल्ड स्टोरेज’ और ‘कंटामिनेशन फ्री’ केबिन की व्यवस्था होगी।

जांच प्रक्रिया में आएगा क्रांतिकारी बदलाव

अब तक उत्तराखंड के दूरदराज के जिलों में अपराध होने पर साक्ष्यों को देहरादून स्थित विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेजने में काफी समय नष्ट हो जाता था, लेकिन अब:

  1. समय की बचत: घटनास्थल पर ही साक्ष्यों का संकलन होने से जांच अधिकारी (IO) को त्वरित दिशा मिल सकेगी।
  2. साक्ष्यों की शुद्धता: अक्सर परिवहन के दौरान साक्ष्य खराब होने का डर रहता था, जिसे यह मोबाइल लैब पूरी तरह समाप्त कर देगी।
  3. कुमाऊं और गढ़वाल में तैनाती: शुरुआत में एक-एक यूनिट दोनों मंडलों के मुख्यालयों पर तैनात की जाएगी, जो जरूरत पड़ने पर संबंधित जिलों में भेजी जाएगी।

पुलिस महानिदेशक और शासन का विजन

उत्तराखंड पुलिस मुख्यालय इस परियोजना को ‘स्मार्ट पुलिसिंग’ का हिस्सा मान रहा है:

  • विशेषज्ञों की टीम: प्रत्येक मोबाइल लैब के साथ एक फॉरेंसिक वैज्ञानिक और तकनीकी सहायकों की टीम तैनात रहेगी।
  • पारदर्शिता: वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर जांच होने से पुलिस कार्रवाई में पारदर्शिता बढ़ेगी और निर्दोषों को परेशान होने से बचाया जा सकेगा।
  • नशा मुक्त उत्तराखंड: एनडीपीएस (NDPS) मामलों में पकड़े गए पदार्थों की मौके पर जांच से नशा तस्करों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित हो सकेगी।

निष्कर्ष: अपराध मुक्त प्रदेश की ओर एक कदम

उत्तराखंड जैसे कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाले राज्य के लिए मोबाइल फॉरेंसिक लैब किसी वरदान से कम नहीं है। धामी सरकार का यह फैसला दर्शाता है कि प्रदेश अब पारंपरिक पुलिसिंग से हटकर ‘टेक्नोलॉजी ड्रिवेन’ सुरक्षा चक्र की ओर बढ़ रहा है। इससे न केवल पुलिस का मनोबल बढ़ेगा, बल्कि अपराधियों में भी कानून का खौफ पैदा होगा।

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