देहरादून: उत्तराखंड में शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने और स्कूलों में शिक्षकों की शत-प्रतिशत उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए शासन ने कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। शिक्षा महानिदेशालय ने राज्य के सभी सरकारी शिक्षकों और कर्मचारियों के लिए 20 जनवरी तक बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली (Biometric Attendance) को अनिवार्य रूप से अपनाना सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। शासन ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर किसी शिक्षक या कर्मचारी की उपस्थिति बायोमेट्रिक मशीन के माध्यम से दर्ज नहीं पाई गई, तो उनका जनवरी माह का वेतन रोक दिया जाएगा। शिक्षा सचिव और महानिदेशक के इस कड़े आदेश से विभाग में हड़कंप मच गया है, क्योंकि कई दुर्गम क्षेत्रों में अभी भी इस व्यवस्था को लेकर हीला-हवाली की जा रही थी।
क्यों लिया गया यह सख्त फैसला?
शासन के पास लगातार यह शिकायतें पहुँच रही थीं कि बायोमेट्रिक मशीनें लगने के बावजूद कई शिक्षक उपस्थिति दर्ज करने में लापरवाही बरत रहे हैं:
- पारदर्शिता का अभाव: कई स्कूलों में शिक्षक रजिस्टर पर हाजिरी लगाकर समय से पहले स्कूल छोड़ रहे थे, जिसे रोकने के लिए बायोमेट्रिक को एकमात्र आधार बनाया गया है।
- समयबद्धता सुनिश्चित करना: बायोमेट्रिक से सीधे रियल-टाइम डेटा शिक्षा निदेशालय के सर्वर पर पहुँचेगा, जिससे पता चलेगा कि कौन सा शिक्षक कितने बजे स्कूल पहुँचा।
- वेतन के साथ लिंकेज: अब ‘नो बायोमेट्रिक, नो सैलरी’ की नीति अपनाई जा रही है। यानी उपस्थिति पोर्टल से प्राप्त डेटा के आधार पर ही ट्रेजरी (कोषागार) से वेतन जारी होगा।
जिला शिक्षा अधिकारियों को विशेष जिम्मेदारी
महानिदेशक ने सभी जिलों के मुख्य शिक्षा अधिकारियों (CEOs) और खंड शिक्षा अधिकारियों (BEOs) को इस आदेश का अक्षरशः पालन कराने की जिम्मेदारी दी है:
- मशीनों की जांच: जिन स्कूलों में बायोमेट्रिक मशीनें खराब हैं या इंटरनेट की समस्या है, उन्हें 20 जनवरी से पहले ठीक करने के निर्देश दिए गए हैं।
- रिपोर्टिंग: अधिकारियों को हर ब्लॉक से उन शिक्षकों की सूची तैयार करने को कहा गया है जिन्होंने आदेश के बावजूद बायोमेट्रिक का उपयोग शुरू नहीं किया है।
- नेटवर्क की समस्या: पर्वतीय क्षेत्रों के स्कूलों के लिए कहा गया है कि जहाँ इंटरनेट बिल्कुल नहीं है, वहां ‘ऑफलाइन’ डेटा स्टोर करने वाली मशीनों का उपयोग किया जाए, जिसे बाद में अपडेट किया जा सके।
शिक्षक संगठनों की मिली-जुली प्रतिक्रिया
इस आदेश के बाद शिक्षक संगठनों में हलचल तेज है। जहां कुछ संगठन इसे सुशासन की दिशा में सही कदम बता रहे हैं, वहीं कुछ का तर्क है कि पहाड़ों में बिजली और इंटरनेट की समस्या के कारण शिक्षकों का वेतन रोकना उचित नहीं है। हालांकि, सरकार ने साफ कर दिया है कि आधुनिक तकनीक को अपनाना अब अनिवार्य है और इसमें किसी भी प्रकार की छूट नहीं दी जाएगी।
निष्कर्ष: सुशासन की ओर बढ़ते कदम
धामी सरकार का यह निर्णय प्रदेश की शिक्षा प्रणाली में जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ा बदलाव है। 20 जनवरी की डेडलाइन यह सुनिश्चित करेगी कि सरकारी स्कूलों के शिक्षक समय के पाबंद बनें, जिससे छात्रों की पढ़ाई पर सकारात्मक असर पड़ेगा। फिलहाल, सभी शिक्षकों की नजरें अब अपने स्कूलों की बायोमेट्रिक मशीनों और पोर्टल पर टिकी हैं।





