देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस इन दिनों एक गंभीर आंतरिक संकट से जूझ रही है। प्रदेश में पार्टी का जमीनी आधार (बेस) लगातार खिसकता जा रहा है, लेकिन इसके विपरीत दिग्गज नेताओं के बीच ‘पार्टी का चेहरा’ (फेस) बनने की होड़ और तेज हो गई है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जनता के मुद्दों पर संघर्ष करने के बजाय, पार्टी के क्षत्रप एक-दूसरे की घेराबंदी करने और अपनी ‘फिल्डिंग’ सजाने में अधिक ऊर्जा खर्च कर रहे हैं।
नेताओं में वर्चस्व का संग्राम: एक-दूसरे की घेराबंदी
कांग्रेस के भीतर चल रही गुटबाजी अब खुलकर सामने आने लगी है। हर बड़ा नेता खुद को आगामी चुनावों के लिए मुख्यमंत्री पद के चेहरे या पार्टी के सर्वोच्च नेतृत्व के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।
- क्षत्रपों की सक्रियता: पार्टी के अलग-अलग गुट अपने-अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं। दिग्गज नेता संगठन पर पकड़ मजबूत करने के लिए अपने करीबियों को आगे बढ़ा रहे हैं, जिससे आपसी खींचतान बढ़ती जा रही है।
- रणनीतिक घेराबंदी: एक-दूसरे को राजनीतिक रूप से पछाड़ने के लिए पार्टी के भीतर ही शह-मात का खेल जारी है। जानकार मानते हैं कि इस ‘संग्राम’ ने कार्यकर्ताओं के मनोबल को प्रभावित किया है।
कमजोर होता कैडर और अनुशासन का अभाव
राजनीतिक विशेषज्ञों का विश्लेषण है कि कांग्रेस अब पूरी तरह से ‘कैडर आधारित’ पार्टी नहीं रह गई है। सांगठनिक ढांचे में कमजोरी के कारण पार्टी में अनुशासनहीनता की घटनाएं भी बढ़ी हैं।
“पार्टी के भीतर जब विचारधारा और संगठन से ऊपर व्यक्ति विशेष की महत्वाकांक्षाएं हो जाती हैं, तो कैडर बिखरने लगता है। उत्तराखंड कांग्रेस में फिलहाल यही स्थिति बनी हुई है, जहाँ नेता अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं, लेकिन पार्टी के आधार को मजबूत करने की दिशा में ठोस काम नहीं दिख रहा है।”
जमीनी आधार खोती पार्टी
एक ओर जहाँ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ‘बूथ स्तर’ तक अपनी पकड़ मजबूत करने का दावा कर रही है, वहीं कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक धीरे-धीरे अन्य विकल्पों की ओर खिसक रहा है।
- जनता से दूरी: आपसी कलह के कारण पार्टी जनहित के मुद्दों पर सरकार को प्रभावी ढंग से घेरने में विफल साबित हो रही है।
- कार्यकर्ताओं में असमंजस: जब शीर्ष नेता ही एक-दूसरे के विरु





