राज्य में आयोजित आपदा प्रबंधन वैश्विक सम्मेलन के दौरान जल संरक्षण के लिए देश–विदेश में ख्याति प्राप्त ‘जलपुरुष’ राजेंद्र सिंह ने आपदा–जोखिम और तैयारियों पर महत्वपूर्ण विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन और बढ़ती प्राकृतिक आपदाएं अब मानव जीवन, पर्यावरण और विकास के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी हैं। यदि हम भविष्य में इन आपदाओं से सुरक्षित रहना चाहते हैं, तो केवल तकनीक या योजनाओं पर निर्भर रहने से काम नहीं चलेगा, बल्कि हमें स्वयं को ‘आपदा योद्धा’ के रूप में तैयार करना होगा।
राजेंद्र सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि आज दुनिया भर में आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ रही हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन, बादल फटने की घटनाएं, हिमखंडों का टूटना और मैदानों में बाढ़ जैसी स्थितियों का बड़ा कारण मानवजनित हस्तक्षेप और पर्यावरण का असंतुलन है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि प्रकृति को चुनौती देकर विकास करने का जो मॉडल हमने अपनाया है, वह अब अपने परिणाम दिखा रहा है। इसलिए हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने वाली विकास नीति अपनानी होगी।
उन्होंने जोर देते हुए कहा कि आपदा–प्रबंधन का पहला नियम है—समुदाय की मजबूती। जब तक स्थानीय लोग आपदा के जोखिम, उसके संकेत और उससे निपटने के उपायों के बारे में जागरूक नहीं होंगे, तब तक बड़े से बड़ा तंत्र भी प्रभावी नहीं हो सकता। उन्होंने बताया कि गांव और शहर स्तर पर ‘आपदा मित्र’ तैयार करने की आवश्यकता है, जो किसी भी आपात स्थिति में तुरंत कार्रवाई कर सकें। राजेंद्र सिंह ने कहा कि “प्रशिक्षण, जागरूकता और सहभागिता” ही आपदा–प्रबंधन की असली ताकत है।
अपने वक्तव्य में उन्होंने जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को आपदा–जोखिम कम करने का प्रमुख आधार बताया। उनका कहना था कि नदियों, पहाड़ों, जंगलों और जलस्रोतों की रक्षा ही आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य दे सकती है। उन्होंने सुझाव दिया कि हर जिले में प्राकृतिक जलधाराओं के पुनर्जीवन, ढलानों की मजबूती, वर्षाजल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण पर आधारित योजनाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
राजेंद्र सिंह ने सम्मेलन के अंत में कहा कि यदि हम प्रकृति को समझेंगे, समुदाय को मजबूत करेंगे और वैज्ञानिक–प्राकृतिक दोनों दृष्टिकोणों को मिलाकर चलेंगे, तभी हम आपदाओं के प्रभाव को कम कर पाएंगे। उन्होंने सभी प्रतिभागियों से आग्रह किया कि वे केवल योजनाओं पर चर्चा न करें, बल्कि अपने–अपने क्षेत्रों में वास्तविक परिवर्तन के लिए ‘आपदा योद्धा’ बनकर काम करें।





