अमरावती/पूर्वी गोदावरी: आंध्र प्रदेश के तटीय जिलों में संक्रांति के दौरान होने वाली ‘मुर्गा लड़ाई’ भले ही कानूनी पाबंदियों के घेरे में रहती हो, लेकिन इस साल यहाँ एक व्यक्ति ने इस खेल के जरिए ऐसी जीत हासिल की है जिसकी चर्चा पूरे देश में हो रही है। जिले के एक स्थानीय निवासी ने अपने प्रशिक्षित मुर्गे पर दांव लगाकर एक ही रात में 1.53 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि जीत ली है। इस जीत के साथ ही वह शख्स रातों-रात करोड़पति बन गया है। गौरतलब है कि इन आयोजनों में करोड़ों रुपये का दांव लगाया जाता है, जिसे रोकने के लिए प्रशासन हर साल सख्ती बरतता है, बावजूद इसके ये खेल बड़े स्तर पर आयोजित किए जाते हैं।
कैसे बनी 1.53 करोड़ की बाजी?
आंध्र प्रदेश के गोदावरी और कृष्णा जिलों में संक्रांति पर मुर्गा लड़ाई का आयोजन एक भव्य उत्सव की तरह होता है:
- तगड़ा दांव: विजेता शख्स ने अपने ‘पोरू पुंजू’ (लड़ाकू मुर्गे) को महीनों से विशेष डाइट और प्रशिक्षण देकर तैयार किया था। फाइनल मुकाबले में स्थानीय रसूखदारों के बीच लगी बाजी में उसने जीत दर्ज की।
- सट्टेबाजी का बाजार: सूत्रों के अनुसार, संक्रांति के तीन दिनों में इन इलाकों में कुल मिलाकर 500 से 1000 करोड़ रुपये तक का सट्टा लगता है। इसमें न केवल नकदी, बल्कि लग्जरी कारें और जमीन के कागजात तक दांव पर लगाए जाते हैं।
- भीड़ और क्रेज: इस बाजी को देखने के लिए पड़ोसी राज्यों से भी लोग पहुंचे थे, जहाँ हाई-स्टेक रिंग में मुर्गों के पैरों में छोटी चाकू (Kattis) बांधकर मुकाबला कराया गया।
प्रशासन की पाबंदी और जमीनी हकीकत
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के सख्त आदेशों के बावजूद, ये आयोजन हर साल आयोजित होते हैं:
- कोर्ट का आदेश: अदालत ने मुर्गों के पैरों में चाकू बांधने और सट्टेबाजी पर पूरी तरह रोक लगा रखी है, इसे केवल पारंपरिक खेल (बिना चाकू और बिना सट्टे) के रूप में अनुमति दी गई है।
- पुलिस की कार्रवाई: पुलिस ने कई जिलों में छापेमारी कर सैकड़ों आयोजकों को गिरफ्तार किया और करोड़ों की नकदी जब्त की है, लेकिन ‘अखाड़ों’ की संख्या इतनी अधिक होती है कि उन्हें पूरी तरह रोकना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
- राजनीतिक संरक्षण: अक्सर इन आयोजनों को स्थानीय रसूखदारों और नेताओं का मौन समर्थन प्राप्त होता है, जिससे पुलिस के लिए कार्रवाई करना मुश्किल हो जाता है।
मुर्गा लड़ाई: परंपरा या जुआ?
यह खेल आंध्र प्रदेश की संस्कृति का एक प्राचीन हिस्सा माना जाता है:
- शौर्य का प्रतीक: कई लोग इसे अपनी प्रतिष्ठा और वीरता से जोड़कर देखते हैं। विशेष नस्ल के मुर्गों की कीमत ही लाखों में होती है।
- पशु क्रूरता का विरोध: पशु अधिकार कार्यकर्ता (जैसे PETA) लगातार इस खेल का विरोध करते हैं, क्योंकि इसमें पक्षियों को गंभीर चोटें आती हैं या उनकी जान चली जाती है।





