नई दिल्ली: भारत की तेजी से बढ़ती शहरी आबादी के बीच महानगरों और मझोले शहरों की हालत सुधारना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। आगामी बजट में शहरी विकास मंत्रालय के लिए बड़े आवंटन की संभावनाओं के बीच विशेषज्ञ आंध्र प्रदेश की नई राजधानी ‘अमरावती’ के सुनियोजित विकास मॉडल को अपनाने की वकालत कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सड़कों और फ्लाइओवरों के निर्माण से शहर नहीं सुधरेंगे, बल्कि इसके लिए ‘लैंड पूलिंग’ और ‘स्मार्ट गवर्नेंस’ जैसे ठोस नीतिगत बदलावों की जरूरत है। इसी परिप्रेक्ष्य में उद्योग जगत और शहरी निकायों ने वित्त मंत्रालय के सामने अपनी 5 बड़ी मांगें रखी हैं, जो शहरी भारत की तस्वीर बदल सकती हैं।
क्या है ‘अमरावती मॉडल’ और यह क्यों है चर्चा में?
अमरावती मॉडल को शहरी नियोजन (Urban Planning) की दुनिया में एक मील का पत्थर माना जाता है:
- लैंड पूलिंग तकनीक: यहाँ किसानों से जमीन लेने के बजाय उन्हें विकास में भागीदार बनाया गया। सरकार ने जमीन अधिग्रहित करने के बजाय ‘पूल’ की और विकसित जमीन का एक हिस्सा मालिकों को लौटा दिया, जिससे कानूनी विवाद कम हुए।
- सस्टेनेबल इंफ्रास्ट्रक्चर: इस मॉडल में ‘वॉकेबल सिटी’ और ‘ग्रीन मोबिलिटी’ पर जोर दिया गया है, जहाँ ड्रेनेज, बिजली की लाइनें और कचरा प्रबंधन के लिए अंडरग्राउंड सुरंगें बनाई गई हैं।
- डिजिटल गवर्नेंस: अमरावती को पूरी तरह ‘डेटा-ड्रिवन’ शहर के रूप में विकसित करने की योजना है, जिसे भारत के अन्य पुराने शहरों (जैसे दिल्ली या मुंबई) में लागू करना एक बड़ी चुनौती है।
बजट 2026: शहरों की सूरत बदलने के लिए 5 बड़ी मांगें
शहरी विकास के विशेषज्ञों और हितधारकों ने बजट में निम्नलिखित प्रावधानों की मांग की है:
- शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) का वित्तीय सशक्तिकरण: नगर निगमों और पालिकाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए विशेष ‘मुनिसिपल बॉन्ड’ को बढ़ावा देने और जीएसटी (GST) में उनकी हिस्सेदारी तय करने की मांग की गई है ताकि वे केंद्र की मदद पर निर्भर न रहें।
- वहनीय आवास (Affordable Housing) के लिए रियायतें: शहरी गरीबों और मध्यम वर्ग के लिए घरों की उपलब्धता बढ़ाने हेतु ‘पीएम आवास योजना’ के तहत सब्सिडी का दायरा बढ़ाने और होम लोन के ब्याज पर टैक्स छूट की सीमा को 2 लाख से बढ़ाकर 5 लाख रुपये करने की मांग है।
- सार्वजनिक परिवहन और ‘लास्ट माइल’ कनेक्टिविटी: मेट्रो परियोजनाओं के विस्तार के साथ-साथ ई-बस सेवा और साइकिल ट्रैकों के निर्माण के लिए भारी निवेश की मांग की गई है, ताकि निजी वाहनों पर निर्भरता कम हो सके।
- जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन: बढ़ते प्रदूषण और शहरी बाढ़ (Urban Flooding) जैसी समस्याओं से निपटने के लिए शहरों में ‘स्पंज सिटी’ (Sponge City) कॉन्सेप्ट को लागू करने हेतु अलग से फंड आवंटित करने का सुझाव दिया गया है।
- स्मार्ट सिटी मिशन 2.0 का आगाज: वर्तमान स्मार्ट सिटी मिशन के पूरा होने के बाद, अब ‘स्मार्ट सिटी 2.0’ की मांग हो रही है, जिसका फोकस तकनीक के साथ-साथ झुग्गी पुनर्वास और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (Solid Waste Management) पर हो।
चुनौतियां और राह
जानकारों का कहना है कि बजट में पैसा देना एक पक्ष है, लेकिन उसे सही तरीके से लागू करना असली चुनौती है। शहरों में बढ़ता अतिक्रमण और पुराना पड़ चुका ड्रेनेज सिस्टम केवल बजट से नहीं, बल्कि कड़े प्रशासनिक फैसलों से सुधरेगा। ‘अमरावती मॉडल’ को देशव्यापी स्तर पर लागू करने के लिए राज्यों के सहयोग की भी अनिवार्य आवश्यकता होगी।
निष्कर्ष: सुव्यवस्थित शहरीकरण ही भविष्य
यदि आगामी बजट में इन 5 मांगों पर ध्यान दिया जाता है, तो भारत के शहर केवल कंक्रीट के जंगल बनकर नहीं रहेंगे, बल्कि रहने लायक (Liveable) और आर्थिक रूप से गतिशील केंद्र बनेंगे। वित्त मंत्री का पिटारा इन उम्मीदों पर कितना खरा उतरता है, यह देखना दिलचस्प होगा।





